Sunday, May 21, 2017

व्यंग की जुगलबंदी - बिना शीर्षक


बिना बात की बात है , बिना काम का काम
बिना सीरसक लेख है, बिन कौड़ी या दाम

नाम वाम के चक्कर में बड़ी घटनाएं या बड़े  लोग पड़ते तो कभी भी  नहीं थे | सेव ससुरा जाने कब से पेड़ से टपकता रहा , मकान भी  गिरते रहे , ऊपर उछाली गई गेंद वापस गिरती रही , आदमी गिरता रहा , तो क्या ये न्यूटन की प्रतीक्षा करते रहते कि पहले हमारे गिरने को नाम दो गुरुत्वाकर्षण का , तभी गिरेंगे , नहीं तो अपनी जगह पर हम धरने पर बैठे रहेंगे |  ना - ये सब गिरते रहे |


वह तो कहो न्यूटन नारियल के पेड़ के नीचे नहीं बैठा था , नहीं तो शायद सौ - डेढ़ सौ साल और निकल जाते इस गुरुत्व-फुरूत्व  को नाम देने में | कितने वीर बालक इस चक्कर में ज़्यादा पास हो गए होते  |  


कोई कवि , जो विज्ञान विषय द्वेषी रहा होगा, कह भी गया है कि ‘प्यार को प्यार ही रहने दो , इसे नाम न दो ‘ |काहे बवाल में पड़ो | क्यों खुजली हो रही है | ठीक से एक जगह बैठ के शान्ति से बीड़ी नहीं पी जा सकती  या ऐसा ही कोई संत टाइप का काम नहीं किया जा सकता |


सारे होशियार पति इसको अच्छी तरह समझते हैं | पत्नी द्वारा बनाये गए तरल द्रव्य को किसी नाम का इलज़ाम देने से पहले झांक झूँक कर और टोह  लेकर जानकारी प्राप्त कर लेते हैं कि जिसको दिल दाल समझ के खाये   जा रहा है , कहीं वह मूलतः पत्नी अनुसार  साम्भर गोत्र का तो नहीं था |


अब १८५७ को ही ले लिया जाय |  मंगल पांडे  ने बन्दूक चला दी, तात्या टोपे, लक्ष्मी बाई आदि सबने बवाल काट डाला, बहादुरशाह दिल्ली में जी भड़भड़ा के बैठे रहे कलम में स्याही भरते हुए कि जैसे ही  थोड़ा खाली  हुए, शायरी झेला डालेंगे , इस बीच कई अँगरेज़ शहीद हो गए | इतना सब हुआ, पर यह सब होने के पहले कोई इस चक्कर में नहीं पड़ा कि इस पूरे घटनाक्रम को क्या नाम दिया जाय | जब सब हो गया तो इस बेगाने बवाल में सारे इतिहासकारों में सिर  - फुटौव्वल मची | और मची क्या अभी तक एक दूसरे का पजामा खींचे पड़े हैं |  एक बोले कि इसे ‘पहला स्वाधीनता संग्राम ‘ कहा जाय | दूसरे पक्ष ने बहुत बुरा माना और कहा कि परिभाषा ‘सिपाही विद्रोह ‘ वाली सही बैठती है | तीसरा मध्यमार्गी निकला, ‘१८५७ की ग़दर’ का नाम चिपका दिया | अभी तक कौआरार  मची  है |


बवाल साहित्य में भी मचा करता है | प्रेमचंद जन चेतना के साहित्यकार थे या भारतीय मूल्यों वाले खेमे के ?    निराला तो प्रगतिवादी थे ही , ये पता नहीं ‘सरस्वती वंदना’ और ‘राम की शक्ति पूजा’ क्यों लिख गए कि  सारे दढ़ियल , झोला छाप वाले  कन्फ्यूज हो गए कि बेटे को अच्छा ख़ासा शीशे में उतार लिया था, लेकिन ये जान को कलेश छोड़ गया |


तुलसी बाबा और झाम पाले थे | उस ज़माने के विद्वान् जब संस्कृत में लिखते थे तो ये अवधी  चुन लाये, एक जनभाषा को  | गाली उस समय के पंडितों से भी खाई होगी और उनको उस समय भी कम्युनिस्ट कह दिया गया होगा | लेकिन बाबा तो बाबा , जब तक लोगों की समझ की मिटटी न पलीद कर दें | लिखा भी तो क्या , भक्ति काव्य | अब पंडितों की गति सांप छछूंदर को प्राप्त हुई | उससे ज़्यादा महर्षि मार्क्स के स्वयंसिद्ध चेलों की हुई | न जनभाषा  उगलते बने और न भक्ति काव्य पचाते | अउर ल्यो ससुर - देव नाम इनको |


देखिये ऐसा है -  कितना भी किसी व्यक्ति की असंयमित ध्वनि ऊर्जा के कारण  सामने वाले की रासायनिक ऊर्जा में खुदबुदाहटपूर्ण परिवर्तन के फलस्वरूप ऊष्मा और फिर गतिक ऊर्जा में परिवर्तन से  आवेगमयी सटाक ध्वनि और ऊष्मा के उत्पन्न होने वाली प्रक्रियाओं को  सारे वैज्ञानिक सिद्धांतों के नाम दे डालिये  , जनप्रिय उक्ति इस घटनाक्रम को इसी तरह बताएगी कि “क्या तौल के कंटाप पड़ा है “ और यह भी कि ज़्यादा इस प्रकार का ज्ञान बघारने पर “आपको भी परशाद मिल सकता है इसलिए तनिक हवा आने दें “


इसलिए कोई विद्वान् पहले ही बता गए है कि ‘नाम-वाम में कुछ नहीं धरा है ‘ |


तब फिर शीर्षक की क्या औकात ?




Wednesday, May 17, 2017

व्यंग की जुगलबंदी - टेलीफोन




इस घोर कलियुग में टेलीफोन का नाम लेने पर कुछ लोग उसी प्रकार की एक्टिंग करते पाए जाते हैं जैसा कि किसी  टाइट जीन्स धारिणी, जस्टिन बीबर  बलिदानिनी, ‘ओह माय गॉड’ शपथ धारिणी , शून्य आकार अभिमानिनी  नायिका को कलकत्ते के बड़ाबाजार में पान मसाला लसित द्रव्य से भरे हुए मुंह से दुकानदार द्वारा ‘बहन जी’  नाम से सम्बोधित कर डालने पर तथाकथित ‘बहन जी’ दिखा डालती हैं    |


खैर,  टेलीफोन तो था - और एकपाए में दोपाया प्रकार का अस्तित्व रखता था - द्वैत और अद्वैत वाद दोनों के बीच की कड़ी था टेलीफोन | उपयोगी अवस्था में एक पाया कान से संलग्न  दूसरा सिरा टेलीफोन उपभोगकर्ता की शातिरपने की मात्रा और  सुविधा के हिसाब से मुंह से पास या दूर रखा जाता था | अनुपयोगी अवस्था  में यह चोंगे पर उन दो पिन पर लटका दिया जाता था जिनमें कोई धार तो नहीं होती थी, पर जिनके बारे में यह मशहूर था कि कितना बड़ा भी फ़ोन हो,  काटा यहीं से जाता है |


फ़ोन अमूमन कृष्ण वर्ण का श्रेष्ठ माना जाता रहा था | कुछ नए  चलन के लोगों ने लाल , हरे और कुछ और रंगों का प्रयोग तो किया किन्तु कालांतर में ऐसे लोगों की कोई ख़ास इज़्ज़त कृष्ण वर्ण टेलीफोन उपभोक्ताओं में नहीं हुई


फ़ोन के चोंगे पर एक गोलाकार डायल हुआ करता था जिसे घुमाकर नंबर मिलाने में एक किर्र-किर्रात्मक संतुष्टि की अनुभूति होती थी | नंबर मिलाने वाला क्षण बड़ा महत्वपूर्ण माना जाता था और इस कारण नंबर मिलावक व्यक्ति डिस्टर्ब किये जाने पर सामने वाले को डाँट सकता था या उसके ऊपर आँखे तरेर सकता था और इसके बाद व्यवधान उत्पन्न करने  वाले को  फर्दर  डांटने वाला काम आस-पास बैठे लोग संभाल  लेते थे |


सारे नंबर डायल करने के बाद नंबर मिलावक सबको ऊँगली से चुप रहने का इशारा कर सकता था और जैसे ही  वह यह कहता “घंटी बज रही है” , सबके चेहरे पर चमक और मन से उच्छ्वास की मिली जुली प्रतिक्रिया एक साथ प्रकट होती थी


किसी ने सिखाया नहीं होता था, पर परंपरा यह थी कि नंबर जितनी दूर का मिलाया गया है , बात करने वाले की  डेसिबेल मात्रा उतनी ही ऊंची  रखी जाय और जो कि  एक परम शिष्टाचार भी का प्रतीक था | ऐसा न करने वालों को बुजुर्ग यह कह कर लसेट  सकते थे कि “अब हर चीज़ तो स्कूल में नहीं सिखाई जायेगी “


किर्र-किर्रात्मक डायल का उपयोग रामसे नामक भूत-प्रेत और भयंकर रस  प्रेमी निर्देशक अक्सर अपनी फिल्मों  में कर लिया करते थे  और जैसा कि मेरे एक मित्र,  जो ‘सत्यकथा ‘ और ‘मनोहर कहानियां’ पत्रिकाओं के नियमित पाठक टाइप  थे, बताया करते थे कि ऐसे  दृश्यों में सिनेमा हालों में कइयों की  फूंकें यहाँ  वहाँ  सरक जाया  करती थी और जिसके वह चश्मदीद गवाह हुआ करते थे |  उनके इस तरह की कथाएं सुनाने का परिणाम होता यह था कि कुछ दिनों तक मोहल्ले के चिल्लर बच्चे फ़ोन के आसपास रात में नहीं फटकते थे |


फ़ोन के साथ महिमामय तार भी लगा होता था जो कि बात बेबात कुछ दिनों बाद बल खा जाया  करता था और उसके (और किसी के भी) कस बल को ठीक करने का शास्त्रसम्मत उपाय यह था कि तार से पकड़ कर फ़ोन को हवा में लटका दिया जाय और बेचारा फ़ोन हेलीकाप्टर बना इस थर्ड डिग्री से त्रस्त  होकर खुद ही अपने कस बल ठीक करने लगता था  | यह काम मक्खी मारने वाले जैसे कामों से ज़्यादा टेक्निकल माना जाता था और इसको करने को घर का हर बच्चा या जवान, जिसका मन होमवर्क या घर के कामों में मन कम लगता था, तत्पर रहता था |  कुछ असंतुष्ट किस्म के बुजुर्ग , जिनका सिद्धांत था कि अगर किसी काम में किसी को आनंद आ रहा है तो ज़रूर कुछ ऐसा है जो गलत हो रहा है और ऐसा कत्तई नहीं होने देना चाहिए, ऐसे लोगों पर कड़ी निगाह रखते थे और आनंद लेने का ज़रा ही सबूत मिलते ही उनके हाथ से यह काम छीन  लिया करते थे या फिर ऐसा वातावरण बना देते थे कि आनंद लेने वाला भ्रमित हो जाय कि बैठ  के नाक में दम  करवाना ज़्यादा उचित होगा या इन तानों से विरक्त होकर अपने काम में आनंद लेते रहना |


कई बार या ज़्यादातर फ़ोन तो एक ही होता था , पर अपने  नंबर के रूप में ३-४ लोगों के और पी पी रूप में ३००-४०० लोगों के विजिटिंग कार्ड या लेटर पैड में सुशोभित होता  था | कई बार लोग एक दुसरे को कार्ड देते लेते और नंबर मिलाते समय ध्यान आता कि पी पी रूप में वहीँ नम्बर दोनों के कार्ड में सुसज्जित है | इस तरह के फ़ोन वाले घरों में एक आध बच्चा इसी काम के लिए नियुक्त होता था कि फ़ोन आने पर पी पी प्रकार के लोगों को ललकार कर बुलाये | जो अच्छे पी पी प्रकार के लोग होते थे वह बुलाने में देर होने पर ज़्यादा बुरा नहीं मानते थे |  


अब नास्टैल्जिया इससे आगे नहीं जा पा रहा है, बहुत सारे मैसेज व्हाट्सप्प और फेसबुक पर इकठ्ठा होते जा रहे हैं , बाकी फिर कभी


काटते है अभी !



Saturday, August 27, 2016

शुक्लागंज के पथ पर - "बेवकूफी का सौंदर्य" का मित्रार्पण - सनसनी खेज किन्तु सत्य कथा

निराला के ज़िले में निराला की तर्ज़ पर निराला से क्षमा याचना सहित 
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तब प्रकट हुए शुकुल   शुक्लागंज  के पथ पर
सड़क भर के कुचलते  हुए गिट्टी पत्थर

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले खड़े हुए स्‍वीकार;
गेहुंआ तन, कुछ  बँधा , कुछ जा चुका यौवन,
नत नयन प्रिय,कर्म-रत मन,
गुरू पुस्तकें  हाथ,

करते  बार-बार मुझ पर व्यंग प्रहार
उसी प्रकार 
जैसे किसी  बीमा एजेंट के सामने कस्टमर ना हो तैयार 
सामने तरु - मालिका, अस्पताल अट्टालिका, प्राकार ।
जा चुकी थी धूप;
बरसात  के दिन
शाम   का टपटपाता  रुप;
उठी उमसाती  हुई पवन ,
कीचड युक्त सड़क जो अनादि काल से न पाई थी बन ,
अब  बातों में व्यंग के साथ बकैती छा गई,
प्राय: समाप्त हो रहा था रात्रि का पहला प्रहर :
और वह  फिर भी खड़े रहे सड़क भर के कुचलते  हुए गिट्टी पत्थर 
देखते देखा मुझे तो एक बार
उस अस्पताल भवन की ओर देखा, छिन्‍नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो तर माल  खा दोपहर नींद सोई  नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी टंकार
एक क्षण के बाद वह लेकर ७ प्रतियां  सुघर,
ढुलक मेरे माथे से गिरे सीकर,
लीन होते खीसें - निपोरण कर्म में फिर ज्‍यों कहा
शुक्लागंज की सड़क पर कुचलते हुए पत्थर -
"ले जाओ ये सारी प्रतियां घर पर "
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इस हादसे के बाद हम शुक्लागंज, ज़िला उन्नाव , के राजपथ पर सरे आम अनूप शुकुल की "बेवकूफी का सौन्दर्य" की ७ प्रतियां  खरीद कर विदा हुए - अपनी समझ में सस्ते में छूटते हुए - यह जान कर  भी कि सारे लेख हम पहले ही फेसबुक पर पढ़ चुके हैं और यहां तक कि उन पर टिपिया भी चुके हैं  और यह भी  कि दिमाग का बर्बाद-ए -गुलिस्तां करने  के लिए एक ही प्रति काफी है  और तिस पर भी जब अगली बार शुकुल महाराज मिलेंगे तो मेरी सारी प्रतियां पलटेंगे और कहेंगे कि इस ६ नम्बर वाली प्रति में कोई निशान नहीं लगा है , इसको खोले नहीं हो क्या  ।

हमें पुस्तक समर्पित करते हुए शुकुल की आंखों में हमने वह भाव देखे जो हर लेखक की शातिर निगाहों में आते हैं जब वह हस्ताक्षर करता है - कुछ आशीष या हमें अच्छा लिखते रहने के आशीर्वाद  देने के भाव जो हमने अपने निजी शातिरपने से पहले ही ताड़ लिए और आँखों से ही हतोत्साहित किया उनको इस मार्ग में और बढ़ने से - लेकिन शुकुल तो शुकुल ठहरे , शुभकामनाएं फिर भी चिपका गए



यह तो सत्यनारायण कथा जैसी कथा हो गई जिसमें अंत तक पता ही नहीं चलता कि आखिर कथा क्या थी यानी पुस्तक कैसी थी - लेकिन अभी इतने से ही नहीं उबर पाए हैं सो पुस्तक के बारे में बाद में ......

यह रही अच्छी वाली फोटो दुबारा मित्रार्पण की । पहले की शाम वाली फोटो के बारे में (जो ऊपर लगाईं है) जब हमने सुना कि हमारी फोटो शुकुल से भी खराब आई है  तो हमने खुरपेंच की  अपनी सुधारने और शुकुल की  बिगाड़ने की - शुकुल की खैर हम और क्या बिगाड़ पाते , अपनी भी न सुधार पाए - तो ये रही थोड़ा और चौकस दिन के समय वाली - घटना स्थल  वही , पात्र वही 

Thursday, August 25, 2016

अथ श्री व्यापकं कथा


व्यापकं व्यापमं 
कांग्रेसं भाजपं 

सत्तर लक्ष लाभान्वितं 
रहे कई आशान्वितं

पंद्रह सौ जेल शोभितं
आठ-नौ सौ पलायितं

पैंतालीस ना जीवितं
सीटी फूंकक शंकितं


बाबू गौर सुभाषितं 
यदि आगत निश्चित गतं 

एल के शर्मा जेलितं
महामहिम उद्वेलितं

हज़ार अयोग्य प्रमाणितं
मेडिकल से निष्कासितं

जनता पूरी शंकितं
उमा भी अति आतंकितं

वांट्स टु नो ये नेशनं
चीखें रविशं अर्नबं

घटनाक्रम कुछ शापितं
व्यापम रक्षति रक्षितं

बात तो निकली निश्चितं
यद्यपि अंत अनिश्चितं


(७  जुलाई २०१५ को फेसबुक पर प्रकाशित)

Tuesday, August 23, 2016

चील गिद्ध कौओं का इतना ही याराना है

चील गिद्ध कौओं का इतना ही याराना है 
एक ज़िंदा कौम को बस लाश सा बनाना है 



लाश बनते तक ज़रा माहौल भी बनाना है 
चिल्ल-पों कांव-कांव नारा लगाना है 



मरते हुए को और ये एहसान भी जताना है 
कि इस तरह से उनको आज़ाद ही कराना है

इक दूसरे को तब तलक धीरे से कुहनियाना है
और साथ साथ आँखों में चुपके से मुस्कियाना है

सियार भेड़ियों को भी इस खेल में मिलाना है
और भोंपुओं के बीच भी , लोथड़ा गिराना है

आप ना मायूस हों, ये यूं ही आना जाना है
शुक्रवार है आपको वीकेंड भी मनाना है


तो मनाते हैं वीकेंड किशोर कुमार के साथ -----

- फेसबुक पर प्रकाशित (४ मार्च २०१६)

(सन्दर्भ - JNU प्रकरण में राष्ट्रीयता की खिल्ली उड़ाने की हद तक पहुँच जाने वाले प्रगतिशीलों के लिए)

केजरि - कथा

केजरि कथा
दिल्ली व्यथा
जो भी हुआ
होना न था
मोदी का डर
आठों पहर
आलोचना
लें अन्यथा
ट्वीटें करें
कुंठा हरें
बस ना करें
जो काम था
गाली बकें
पर ना थकें
स्तर गिरा
है सर्वथा
अब क्या करें
ये दिन फिरें
दिल्ली यथा
राजा तथा
(लिखते लिखते फील हुआ कि इसको येशुदास के गीत 'माना हो तुम ' की धुन पर गाया जा सकता है, गायें , कोई रोक टोक नहीं है )
- फेसबुक पर प्रकाशित (२७ जुलाई २०१६)

Monday, October 21, 2013

एक शरीफ चिंता

सीएटल के शानदार कवि सम्मलन 'झिलमिल २०१३' के लिए लिखी गई कविता । किसी वजह से मेरे फ़ोन पर पूरी डाउनलोड नहीं हो पाई , इसलिए कवि सम्मलेन में पूरी नहीं पढी अब पूरी कविता यहाँ !


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मित्रों मैं चिंतित होता हूँ

खा पी कर मन भर जाता है, पीना सर पर चढ़ जाता है
तब मन थोडा भर आता है, कुछ जगता हूँ कुछ सोता हूँ
मित्रों मैं चिंतित होता हूँ

ये घोटाला वो घोटाला, इन भ्रष्टों का हो मुंह काला
सुरसा सा मुख घूस खोर का, मांगे हरदम बड़ा निवाला
सौ में काम जहां होता था दो हजार अब देता हूँ
देकर मैं चिंतित होता हूँ

राह चले जब किसी मनचले, की सीटी जब बजती है
सच्ची मुट्ठी भिंचती मेरी, नथुनों से आग बरसती है
मन ही मन गुस्सा होता हूँ
उचित प्रतिक्रिया और शराफत बीच कहीं मैं खोता हूँ
फिर भी मैं चिंतित होता हूँ

गर्मी में ए सी को चलाकर, बोरा भर पेट्रोल जला कर
प्लास्टिक के टुकड़े छितरा कर, गंगा में गंदगी बहा कर
महंगाई और ग्लोबल वार्मिंग इन सब पे मैं रोता हूँ
मित्रों मैं चिंतित होता हूँ


जगद्गुरु भारत का रुपया , गिरा देख शर्माता हूँ
७० तक जायेगा ये सोच , मैं दो हफ्ते रुक जाता हूँ
६१ पर डॉलर भेजूं तो , दस हज़ार मैं खोता हूँ
मित्रों मैं चिंतित होता हूँ

ख़त्म हुआ देखो शटडाउन, कितने बिजी थे सारे क्लाउन
मैं कन्फयूज्ड था, वो कन्फयूजिंग, अमरीका की वैल्यू डाउन
मैं जगता था रात-रात भर वो सोते थे
कहते थे चिंतित होते थे
वो भी तो चिंतित होते थे

हे चिंतित ना होने वालों , क्या चिंतित को सम्मान न दोगे ?
कम से कम चिंतित तो हुआ ,अब क्या बच्चे की जान ही लोगे?

चिंता मेरी सदा संगिनी, मैं बंदी वो मेरी बंदिनी
चिंता की चिंता में रहता, नित इक चिंता बोता हूँ
मित्रों मैं चिंतित होता हूँ

चलिए सब चिंतित हो जाएँ, ताली हर कविता पे बजाएं
चाय समोसे और पकौड़ी, खाकर हम चिंतित हो जाएँ
गप्प चुटकुले सुनें सुनाएँ , अपने पेट पे हाथ फिराएं
फिर थोडा चिंतित हो जाएँ
चलिए सब चिंतित हो जाए

Wednesday, September 19, 2012

मेकिंग ऑफ़ अ व्यंगकार !!

मेरा आजकल प्रेरित होने का टाइम चल रहा है| घूम-घूम के, छांट-छांट के, चुन-चुन के प्रेरित हो रहे हैं| कुछ काम नहीं था तो एक व्यंगकार जी से २-४ छटांक प्रेरणा काटी और चढ़ा लिए कुछ घूँट!

अब लो झेलो, प्रेरणा अन्दर और कुछ कवितायें कूद के बाहर| कसम से - रोकने की कोशिश बहुत की, मगर जब दिमागी डायरिया होता है तो ऐसे ही प्रवाहमान होता है |

हमारे एक मित्र ने कह दिया - क्या चीज़ हो?  तो हमने जवाब यों दिया-

  क्या चीज़ हो?
 अरे, तो ये नाचीज़ भी कोई चीज़ है !
अगर कोई  चीज़ चीज़ न हो
तो क्या नाचीज़ होती है?

चीज़ बन जाऊंगा
 तो क्या मेरा मोल लग जाएगा?
क्या दूकान पर बिक जाऊंगा?
जो ज्यादा बिक गया
तो क्या सर्वोत्तम चीज़ का पुरस्कार ले आऊँगा?
अहाहा ! लिख कर मैं खुद पर मुग्ध हुआ | मित्र न हुए, न सही - खुद न लिख पाने का अहसास कचोट गया होगा उनको |

अब चलें, दो-चार ब्लॉगर जन के यहाँ टीप आयें, उनको अपने ब्लॉग का लिंक दे आयें|  उम्मीद करते हैं ऐसा करने का बाद, 'अद्भुत' , 'करारा  व्यंग' , 'ज़बरदस्त चपत' और 'बहुत ही प्यारा' आदि की प्रति-टीप देखने को मिलेगी

ठीक है, अब जब इतना पढ़ लिया है तो और मुलाहिजा -

मेरे कविता चलती नहीं
क्योंकि इसके पैर नहीं होते
मेरी कविता बोलती नहीं
इसके अपना (सा) मुंह भी नहीं है
मुंह नहीं है इसलिए
कि  इसके पास सर नहीं है

तो क्या मेरी कविता बेसिरपैर की है?

वाकई अद्भुत!!

प्रेरणा सप्लाई ज़ारी है,
 ये की बोर्ड ही  धीरे चलता  है |
विचार तेज़ आते हैं|

विचार को अगर ज़ल्दी यूज़ ना करो,
तो विचार अचार बन जाते हैं|
फिर हमारे आचार-विचार को प्रभावित करते हैं |
और हमारा यों प्रचार करते हैं
कि हम लाचार हो जाते हैं
कि  हम समाचार हो जाते हैं

ई ल्यो , फिर कविता ससुरी निकल पड़ी|
लिख तो दिए हैं, न समझ पाए हो तो कोई पुरस्कार दिलवाओ न इसपर !!
(और जो समझ गए तो हमको भी भी बताना कि ई का भरा है हमरे अन्दर )

Tuesday, November 29, 2011

एक ब्लागर मीट जो महान होते-होते बची !

समय - शिव कुमार मिश्र जी का कार्यालय, कोलकाता (समय के साथ कोलकाता इसलिए कि कोलकाता समय और काल से परे हो चुका है)
स्थान - १५ नवम्बर, २०११ - करीब ८ बजे ( स्थान के साथ समय इसलिए कि कोलकाता नगरी का ये इस समय का स्नैप शाट है)
भीड़ - अनूप शुक्ल उर्फ़ फुरसतिया, शिव कुमार मिश्र 'दुर्योधन की डायरी' वाले, इन्द्र अवस्थी उर्फ़ ठेलुवा अर्थात माइसेल्फ़, बिनोद गुप्ता (एक नान ब्लॉगर किस्म के जीव), प्रियंकर पालीवाल (अनुपस्थित)

वैसे तो शुकुल ज़्यादातर कानपुर में पाए जाते हैं लेकिन ऐसा संयोग बना कि इलाहाबाद स्थित अपने  कॉलेज में अपने बैच का रजत जयंती समारोह मनाने के बाद हम और बिनोद इलाहाबाद से और शुकुल अपनी  तथाकथित आधिकारिक यात्रा पर कानपुर से एक ही दिन कोलकाता में डाउनलोड हुए !

बिनोद के बारे में पहले - बिनोद हमारे वह मित्र हैं जिनके बार में हम दोनों यह अफवाह उड़ाया करते हैं और उड़ाते - उड़ाते मानने  भी लगे हैं कि नर्सरी से इंजीनियरिंग कॉलेज तक हम साथ ही पढ़े हैं. एक बार बहुत गौर से हमने अकेले बैठ के सोचा भी तो पाया कि कक्षा १० में हम एक साथ नहीं थे. हमने दबी जबान बिनोद से इसका ज़िक्र भी किया. बिनोद ने जवाब में हम पर आँखों ही आँखों में तरस खाते हुए पुरानी अफवाहों को बदस्तूर जारी रखा. 

खैर, नियत समय पर शुकुल का फ़ोन आते ही हम और बिनोद मुंह उठाये मिश्र जी के ऑफिस पहुँच गए. वहाँ शुकुल कुर्सी पर तोंद ताने, बकौल के पी सक्सेना, लादेन की तरह लदे थे. यह शाम का वह आदर्श समय था जब शास्त्रों के अनुसार समोसा खाने से कई जन्मों के पाप कट जाते हैं.

पता लगा  प्रियंकर जी नहीं आ पायेंगे.

खैर , परिचय-वरिचय हुआ, बिनोद ने मौका ताड़कर नर्सरी से इंजीनियरिंग वाली बात मिश्र जी को झेला दी थी. चूंकि मिश्र जी एक विनम्र आतिथेय थे, सो उन्होंने प्रत्युत्तर में आश्चर्य जताया जैसे कि इस घोर कलियुग में भी ऐसा कैसे हो सकता है और इस प्रकार विनोद को उन्होंने अपने हिसाब से संतुष्ट किया.

हम और बिनोद चूंकि ताजे-ताजे कॉलेज से आ रहे थे और वहाँ हमारे सिल्वर जुबिली कार्यक्रम के एक-आध लोकल पेपर वालों ने हमसे कुछ पूछा और हमारे जवाब को उन्होंने हेडिंग के रूप में भी चौथे पेज के कोने में छाप दिया था, सो हम ओवर कांफिडेंस से सराबोर थे. हमको लग रहा था कि अब इस ब्लॉगर मीट में भी हमारे मुंह से छपने वाले और कम से कम हेड लाइन वाले उदगार तो निकलेंगे ही. हम तो बिलकुल ही तैयार थे. शुकुल भी हमारी इस अदा से आतंकित लग रहे थे.

जिस चीज़ का हमने अनुमान नहीं किया था और जो बिलकुल अप्रत्याशित थी, वह थी किसी नान-ब्लागर की हमारे बीच उपस्थिति. बिनोद ने नर्सरी-इंजी. काण्ड के बाद तो मैदान पूरा अपने हाथ में ले ही लिया था. 

अब नान -ब्लागर को ब्लागर की दशा के बारे में क्या पता. यहाँ तो 'आप कितना अच्छा लिखते हैं' , 'और लिखिए न' कहकर अपनी ओर बातों सिरा मोड़ने की कला का कितनी बार अभ्यास कर चुकने के बाद फंस गए एक नान-ब्लॉगर के चक्कर में. बिनोद ने ब्लागिंग के अलावा मिश्र जी का सारा इतिहास पूछ डाला और उनके बारे में इतना ज्ञान प्राप्त कर लिया जितना एक पुलिस वाला किसी हिस्ट्री शीटर के बारे में ३-४ सालों के अथक प्रयास के बाद कर पाता है. बीच में शुकुल ने बात संभालने का असफल प्रयास किया मिनमिनाते हुए, एक उलाहने देते हुए कि 'हम लिखते क्यों नहीं?'

लेकिन यह वह समय था जब समोसे आने की संभावना बढ़ गयी थी और स्पष्ट है कि इस संभावना ने हमको प्रोत्साहित किया कि हम शुकुल को थोड़े देर के लिए इग्नोर करें सो हम भी मिश्र जी के इतिहास पर आये. लेकिन तब तक समोसे आ गए, ढोकलों के साथ ढोलक बजाते हुए, साथ  में सन्देश का मीठा संदेसा भी लाये. अब हमारे सामने इन सब पर टूट पड़ने के अलावा कोई चारा न रहा.

 इस बीच हमारे एक और मित्र ( नान-ब्लॉगर कहीं का) फोन पर प्रकट हुए और हमको और बिनोद दोनों को धमकाने लगे उनके घर पहुँचने के लिए. उन मित्र ने भी हमारा काफी फुटेज खाया तब जाकर अंतर्ध्यान हुए. शुकुल इस बीच हमारे समोसों को देखते हुए अपना खाते रहे. मिश्र जी इस सारे कंफ्यूजन का आनंद लेते रहे. बिनोद का काफी समय गुज़र चुका था हमारे फोन को मित्र को अपनी व्यस्तता जताने में.

अब बिनोद फिर मिश्र जी की तरफ घूमे, उनके कारोबार के बारे में और जानकारी इकठ्ठा की और फिर शेयर मार्केट के बारे में बचे १२ मिनट में २७ सवाल पूछे. अब मिश्र जी के सामने कोई रास्ता न बचा यह कहने के सिवाय कि उनको घर जाना है और 'हम लोगों को भी देर हो रही होगी'.

तो हम बाहर निकले. मन में बहुत कुछ अटका लग रहा था. शुकुल से टोह ली तो वह भी खीसें निपोर कर रह गए. खैर, बाहर हमने कुछ फोटो-शोटो भी ली. बल्कि जाते हुए दो बच्चों को पकड़ के और एक के हाथ में कैमरा देकर और दूसरे को चालाकी पूर्वक अपने बगल में खड़ा करके फोटो भी खिंचवाई. उसके बाद शुकुल अपने होटल, मिश्र जी अपने घर और हम बिनोद के साथ बिनोद के घर चल पड़े अपनी नर्सरी से लेकर इंजीनयरिंग की यादों को ताज़ा करने.




इस प्रकार कोलकाता के समाचार पत्रों को बढ़िया हेड लाइन से और ब्लॉग जगत को एक महान ब्लाग र मीट से वंचित होना पड़ा. अच्छा ही हुआ, नहीं तो इस मीट के महान बनते ही कई और मीट कम्पीटीशन में आ खड़े होते और फिर ब्लॉग जगत में जो जूतम-पैजार होती.

आखिर नर्सरी से इंजीनियरिंग की दोस्ती भी कोई चीज़ होती है. है कि नहीं? सो वो दोस्ती काम आ गयी नहीं तो...

शुक्रिया बिनोद!

 




Wednesday, October 01, 2008

किसी के उकसाने पर ब्लागियाने की ज़रूरत क्या थी?

शुकुल को समर्पित -
बिन छन्द, बिन ताल, कुछ चिल्लर चिन्तन
:-१८ अप्रैल २००६ को प्रस्फुटित

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किसी के उकसाने पर ब्लागियाने की ज़रूरत क्या थी
काम अपना छोड़ के टिपियाने की ज़रूरत क्या थी

माना हमारे साथ बनती नहीं तुम्हारी
पर किसी और के संग खिलखिलाने की ज़रूरत क्या थी

अब जैसा भी है हमने यहाँ पे लिख दिया
पर इसपे भी ताली बजाने की ज़रूरत क्या थी

माना कि दुनियावी भीड़ में हम भी हैं यूँ खड़े
पर हमको भीड़ में है कोई जताने की ज़रूरत क्या थी

यूँ दिखते हो बेखबर और हमसे अलग अलग
पर राह देखने को खिड़की पे जाने की ज़रूरत क्या थी

बाहर हो बंद बोलती और फूक सरकती
तो घर में झूठी शान दिखाने की ज़रूरत क्या थी

भागते भूत की लंगोटी भली सुना
पर अदृश्य भूत को लंगोटी लगाने की ज़रूरत क्या थी

रिक्शेवाले की अठन्नी मार के हो खुश
पर मंदिर में रुपैया चढ़ाने की ज़रूरत क्या थी

कहते हो जाओगे वापस वतन इक दिन
फिर ग्रीन कार्ड बनवाने की ज़रूरत क्या थी

पेट्रोल के दामों को तुम रोते रहोगे यूँ
फिर दहेज में गाड़ी लाने की ज़रूरत क्या थी

खुद तो रहे कुलच्छनी निकम्मे जहान के
सुंदर सुशील का इश्तिहार छपाने की ज़रूरत क्या थी

भ्रष्ट नेताओं पे आक्रोश है बहुत
तो घूस दे के काम निकलवाने की ज़रूरत क्या थी

जब ब्लाग में पड़े हैं सब सूरमा बड़े
ऐसे में ठलुअई दिखलाने की ज़रूरत क्या थी?

Wednesday, March 22, 2006

सररर... पोर्टलैंड में

जब जीतू भैया और शुकुल ने होली का विवरण दे डाला तो हमने सोचा कि हमारा पोर्टलैंड क्यों पीछे रहे. हमलोगों ने भी यहाँ ११ मार्च को 'हिंदी संगम' के तत्वावधान में होली मना डाली.

कार्यक्रम की शुरुआत हुई कवि सम्मेलन से. फिर हुआ सिलसिला होली की उपाधियों का. 'मिलिये मेहमान से' कार्यक्रम में लालू जी घुस आये. उनका साक्षात्कार हुआ. फिर हुआ समूह गान जिसमें लोग नाचे, ढोलक, मंजीरे बजाये और अपनी पसंद का गीत गाया.और हाँ, अंत में कवि सम्राट का पुरस्कार भी जनता के वोट द्वारा दिया गया.



कुल मिला कर सफल रहा सब कुछ. करीब ३०० लोग इकट्ठा हो गये थे इस बार.

लीजिये हाजिर है उपाधियाँ आपकी सेवा में. आप मदद करें इनको पहचानने में (सस्पेंस बनाने का प्रयास, सुना है जनता इससे थ्रिल्डावस्था को प्राप्त होती है)



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१.
जंगल में अब भी है भालू
और समोसे में है आलू
गुंडा तो अब भी है कालू
छोड़ गया पर हमको लालू

२.
तीन देवियों के चक्कर में, फंस गया मैं बेचारा
शादी ही कर लेता भैया, क्यों रह गया कुंवारा
घुटने घिस गये इस चक्कर में, करना पड़ा रिप्लेस
पार्टी का बन गया मुखौटा, भूल गया मैं अपना फेस

३.
फोटो सबके साथ खिंचाता, नेता हो या अभिनेता
पेज ३ से दोस्ती अपनी, सबसे पंगा लेता
हीरोइन से बातें मेरी, कर लीं किसने टेप
मंत्री संतरी को दूं गाली, कैसे मिटाऊं झेंप

४.
ज़ुल्फ लहरायी तो, बालर को पसीना आ गया
रन की हो बरसात, सावन का महीना आ गया
बल्ले वाला धोबी है, बालर को कसके धोये
टीम सामने वाली, सर पीट-पीट के रोये

५.
कह दो ना कह दो ना, यू आर माई बाप सोनिया
चरण पादुका तेरी लेकर, तेरे नाम से राज किया
वैसे तो स्कालर हूं, पर ऐसा भक्त हूं तेरा
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा

६.
जवां थे सुपर स्टार थे, अब तो हैं मेगा-स्टार
कजरारे नैना भी करें, इनसे अपना इकरार
पान खायें या रंग बरसायें, इनका ऊंचा काम
अब ये हैं तो इनके अंगने, नहीं किसी का काम

७.
कभी असेम्बली भंग कराऊं, बंद खाते खुलवाऊं
हुकुम चलाऊं पीछे से मैं, सबपे मैं गुर्राऊं
घोटाले सब इंटरनेशनल, मुझसे कुछ जो कहियो
मैं मैके चली जाऊंगी, तुम देखते रहियो



उत्तर अगले अंक में.........
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Tuesday, March 21, 2006

कम्युनिस्ट पर लेख

तो कम्युनिस्ट एक प्रजाति है जो भारत के पूर्वी भाग में बंगाल और दक्षिण में केरल के तट पर पायी जाती है. इस प्रकार के जीव में कई तरह के मुंह, एक नाक और दूसरे के दिमाग से चलने वाला दिमाग, बेतरतीब दाढ़ी और कंधे पर झोला पाया जाता है. कभी - कभी बिना दाढ़ी वाली एक उपजाति भी दृष्टिगोचर होती है, परंतु दाढ़ी वाला प्रकार श्रेष्ठ माना गया है. इनका आकार-प्रकार मनुष्यों से मिलता जुलता है और सावधानी न बरतने पर पहचान का धोखा हो सकता है.

हर चलने वाली चीज की गति से यह उसी प्रकार चिढ़ता है ज्यों मेरी भूतपूर्व गली में रहने वाला श्वान चलती हुई साइकिल या स्कूटर से चिढ़ता था और उसके पीछे दौड़ पड़ता था और अंत में उसके रुकने पर ही शांत होता था. सो उसी प्रकार यह जीव भी चलते हुए कारखाने, उद्योग और कभी - कभी तो चलते हुए ट्राफिक की गति से भी भड़कता है और बंद का ऐलान कर देता है. गति से चिढ़ने की यही प्रवृत्ति प्रगति वाद के नाम से लोकप्रिय है.

पूर्वजन्म के कर्म सिद्धांत पर इस प्रजाति के लोग श्रद्धा की हद तक विश्वास करते है और मान कर चलते हैं कि ये इस जगत से कुछ लेने या मांगने आये हैं कुछ लौटाने या देने नहीं. इसीलिये झुंड में यह लोग ' देना होगा- देना होगा' या 'हमारी मांगें पूरी करो' नामक मंत्र का सामूहिक रूप से जाप करता दिखायी पड़ता है। कभी-कभी तो इन्हें यह भी नहीं पता होता है कि इन्हें लेना क्या है, लेकिन सच्चे कर्मयोगी की भांति ये तुच्छ वस्तुएँ इन्हें अपने मार्गसे विचलित नहीं करतीं.


इनके दिमाग में यह विचार इंजेक्शन से भर दिया गया है कि इतिहास और साहित्य इनके लिये वह गरीब की जोरू हैं जिससे ये जब चाहे छेड़ सकते हैं और रखैल भी बना सकते हैं. भूतकाल को ये भूत गाली देते हैं, वर्तमान में जीते नहीं और भविष्य बदलने का संकल्प लेकर चलते हैं और उसके न बदलने की सूरत में इतिहास को तोड़ मरोड़ कर बदल डालते हैं. वैसे इस प्रक्रिया में ये लोग कई जगह स्वयं इतिहास बन चुके हैं.

यही हाल यह साहित्य का भी करते हैं. इन्होंने काफीहाउसों में बैठकें करके यह तय कर लिया है कि आम आदमी सिर्फ गाली-गलौज करता है.
जो लिक्खाड़ जितनी गाली गलौज करता है, उतना ही वह जन के नज़दीक, उसके लिये उतनी ही तालियाँ, और इस तरह वह उतना ही बड़ा साहित्यकार माना जाता है.

झुंड में यह विश्वविद्यालयों, मिलों और सरकारी अनुदान से चलने वाले एन.जी.ओ. के आसपास पाये जाते हैं. इस प्रजाति के प्रलुप्त होने के खतरे को भांपकर जे एन यू नामक एक अभयारण्य भी स्थापित किया गया है जहां यह निर्भय होकर विचरते हैं.

लुकाछिपी खेलने में ये माहिर होते हैं जिसमें डेमोक्रेसी को अक्सर चोर बनाया जाता है. डेमोक्रेसी इन्हें ढूंढ़ती रहती है और न ये पकड़ में आते हैं न उसकी पट्टी खोलते हैं। बीच-बीच में आकर कुकू क्लाक वाली चिड़िया की तरह ये डेमोक्रेसी के पास आकर 'चोर-चोर' चिल्लाकर दूर भाग जाते हैं. उसकी पट्टी पांच साल में आकर खोल जाते हैं, फिर दुबारा चोर बनाने से पहले कुछ दिनो तक 'दोस्त-दोस्त' खेलते हैं.

ये बंगाल में १९७७ के चुनावो के बाद से लगे हैं, लगभग उसी साल जब मेरी कुछ पुस्तकों में दीमक लगी थीं.तो फरक यह है कि मेरी किताबों का कुछ अंश नष्ट करने के बाद दीमकों ने चुल्लू भर दवा में डूब कर मोक्ष की प्राप्ति कर ली थी.

गरीबी, बेरोजगारी का वातावरण इनके पनपने के लिये बहुत मुफीद होता है. वैसे इस प्रश्न पर विद्वानों में मतभेद है क्योंकि कुछ लोगों का मानना है कि इसका उल्टा सत्य है यानी इनका होना गरीबी और बेरोजगारी के लिये उपयुक्त है.

इनके धर्मग्रंथ का नाम दास कैपिटल है जिसमें इनके लिये सब कुछ सोच लिया गया है और उस पर टीका टिप्पणी और व्याख्या का अधिकार इन लोगों ने इस वैश्वीकरण के दौर से बहुत पहले चीन और रूस को आउटसोर्स कर दिया था. इस तरह ये बची हई ऊर्जा का इस्तेमाल गाली - गलौज, हड़ताल, बंद, जुलूस इत्यादि रचनात्मक कार्यों में करते हैं.

वैसे ज्यादातर लोग कह सकते हैं कि क्या करें ऐसे लोगों का, लेकिन हमारी बिनती यही है आपसे कि हो सके तो कुछ कीजिये, वरना ऐसा न हो कि आप बाद में कहें कि पहले क्यों नहीं बताया.

..........लेख समाप्त

Thursday, September 22, 2005

बबुरी का बबुआ - भये प्रकट कृपाला

बबुरी का बबुआ बढ़ गया एक साल और आगे, जहां था वहीं से (क्योंकि यही तो ललकार थी उसकी). अहसान किया मान्य नियमों पर कि कि जहां था वहीं से आगे बढ़ा. अगर जहां नहीं था वहां से आगे बढ़ने की घोषणा कर देता तो क्या कर लेते.

तो जहां था वहीं से आगे बढ़ गया. मर्द (या ठाकुर) की एक बात. कह दिया तो कह दिया. और सितंबर के महीने में बढ़ा. अब जैसा कि ठाकुर खुद बता चुके हैं कि सितंबर अवतार में इनका कोई दोष नहीं है उसी प्रकार एक साल और आगे बढ़ने में भी इनका कोई हाथ नहीं था. वैसे भी समय और ठाकुर कब एक दूसरे के साथ चले हैं.

कविताएं कभी हमें पढ़ के समझ में नहीं आतीं. कोई प्लेट में सजा के लाये और बताये कि देखो इस प्रसंग में कितनी अच्छी बात कही गयी तो थोड़ा समझ में आती है. या कोई कवि फर्स्ट हैंड सुना रहा तो बाडी लैंगुएज के साथ जल्दी समझ आती है. ( अपवादस्वरूप वीर रस में बाडी लैंगुएज की जरूरत नहीं पड़ती, हम पढ़ के दूर से ही समझ जाते हैं). अब 'अतीत ज्यों तलहटी में पड़ा सिक्का' से हम क्या समझें? हमने बैठ कर कई तरह से सोचा.
ठाकुर गरज रहे है - 'ऐ अतीत, तू बीत गया है. तेरी यह मजाल. जा तेरी गति फेंके हुए सिक्के सी हो, जिसे फेंककर हम भूल भी गये हैं कि इस पैसे के हम चने भी खा सकते थे. जा, मैं तेरा मुँह भी नहीं देखना चाहता (जैसे चाहते तो देख लेते)'
ठाकुर मिमिया रहे हैं - ' हे आदरणीय अतीत, तुम चले गये, हम तुम्हारा इंतजार वर्तमान में करते रहे. अब तलहटी के सिक्के की भांति हाथ से फिसल गये हो और हमें टीज कर रहे हो कि देखओ इस पैसे की तुम बीड़ी फूंक सकते थे और दम हो तो अभी भी कूद के पा सकते हो. हा, तुम क्यों फिसले?'
ठाकुर दार्शनिक होते हैं - 'जो आया है वह जायेगा. जो गया है वह आयेगा. जो खाया है वह निकलेगा, जो निकला है वह फिर खाया जायेगा. हे अतीत, तुम अतीत हो चुके हो, परंतु हमें तुम पानी के नीचे सिक्के की भांति दिखते हो. तुम्हें फिर से मुट्ठी में करके वर्तमान बनाया जा सकता है.'

हम ठाकुर की तरह-तरह की मुद्राऐं बनते और बिगडते देखते हैं, फिर अर्थ निकालते है.

ठाकुर कर शुभचिंतकओं की कमी नहीं. इनकी छोटी से छोटी बात पर लोगों की नींद हराम हो जाती है. बालक जब नया-नया इंडोनेशीया पहुंचा तो पहली फोटो ईमेल की, ठाकुर गन्ने के खेतों में अकेले खड़े हुए. जनता चिंतातुर होके टूट पड़ी प्रश्नों के साथ
- ठाकुर अकेले खड़े हैं.
- हाँ, लोटा तो नहीं दिखा हमें भी
- क्या है नहीं?
- क्या यह फोटो वारदात से पहले की है या बाद की?
- ठीक कहते हो, यह बाद की बात है, सारे सबूत मिटाने के बाद

इस हादसे पर करीब १९ मेलों, ८ फोनों का १२-१२ परिवारों के बीच आदान-प्रदान हुआ.

तो यह है ठाकुर की लोकप्रियता का प्रमाण.

बड़े बीहड़ किस्म का संवेदनशील जंतु है ठाकुर. जैसा फुरसतिया मुनि बतलाते हैं, बड़े हिसाब से पत्र लिखने पड़ते हैं ठाकुर को. पत्रों के सारे प्रश्नों का बाकायदे बही खाता मेंटेन करते हैं यह. तगादे यों हो सकते हैं, 'मेरे तीसरे पत्र के पांचवे पैरे में चौथे प्रश्न का उत्तर नहीं मिला' (शुकुल से टोपा) या 'प्रियवर , (गुस्से में गुरुवर) आपने नंदू को जो उत्तर अभी भेजा है, वह मैंने मार्च १९८८ में रात को ७ बजे किदवईनगर में पूछा था'. कोई सुपारी ले तो बताना ये भाई फाइलें चोरी करवानी हैं ठाकुर की तिजोरी से.

ठाकुर मोतीलाल नेहरू री. इं कालेज में हमारे जूनियर रह चुके है. ठाकुर कालेज में ही कवि निकल गये थे और तभी से हम अकवि लोगों पर इम्प्रेशन झाड़ते रहे हैं. इस प्रक्रिया में कुछ कविताएँ तो हम वाकई समझ भी चुके हैं. जूनियर परंपरानुसार पुत्रवत होता है (शुकुल अपवाद हैं, वैसे एक कारण यह भी बताया गया है और जिसकी जांच हम कर रहे हैं कि वह सीनियर थे). लिहाजा टाकुर को बधाइयाँ और जहाँ थे वहीं से आगे बढ़ते रहने के लिये शुभकामनाएँ.

Saturday, September 17, 2005

तुलसी सं‍गत शुकुल की - हैपी जन्मदिन

बचपन में सुरसा की नाक और बडेपन (या बडप्पन??) में लोगों के फटे में उंगली करने वाला कल एक और साल बासी हो गया उसी पुरानेपन की ठसक के साथ जो चावल में है, दारू में है या फिर अचार में है.

बहुत झेलना पडता है शुकुल की वजह से. इनके साथ रहने पर कुछ इस तरह के भाव प्रकट किये जाते हैं सामान्य जन द्वारा , समय-काल और परिस्थितियों के हिसाब से कभी मेरे लिये (और कभी शुकुल के लिये)

- भई , बडे-बडे आदमियों का साथ है
- ठलुआ की संगति और किससे?
- ल्यो आ गये ये भी!
- इन दोनों को बैठा रहने दो, हमलोग चलते हैं.
- इन लोगों की हंसी ही नहीं बंद हो रही है.
- तो ये कुछ काम-वाम भी करते हैं

सारी टिप्पणियों का बैलेंस-शीट बनाकर देखना है कि नफा-नुकसान कितना है.

शुकुल बडे महीन हैं, लखनऊ की गालियों की तरह - जो पडती हैं पर खाने वाले को समझ में नहीं आतीं और जब आती हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है. शुकुल से कल बात हो रही थी तो पता चला कि शुकुल को आज २-४ ब्लाग और करीब १६ टिप्पणियां समर्पित की जा चुकी हैं. श्री शुकुल-शिकवा यह था कि किसी में खिंचाई नहीं है. (याद आयी जितेन्द्र की एक पुरानी फिल्म जिसमें बिना मार खाये उनके जोडों में दर्द रहता था). इस पर स्वाभाविक था कि किसी ने पूछा कि भई आप की खिंचाई कौन करेगा. अब जैसा कि शुकुल ने हमको सुनाया कि उन्होंने जवाब दिया था कि खिंचाई करने वाला अभी सो रहा है.
हमने भी जवाबी महीनी दिखायी बिना धन्यवाद के खींचक का खिताब मन ही मन ऐक्सेप्ट किया. पहले तो मानसिक गुदगुदी का आनंद लिया इस इशारे को अपनी तरफ समझते हुए. हमारे आलसीपने को सब सूट भी कर रहा था कि देखो कुछ करना भी नहीं पडा इसके लिये. पर बत खत्म होने के २६ मिनट बाद आफिस के प्लास्टिक वाले नकली बोधि व्रिक्ष के नीचे सूजन रूपी सुजाता की बनाई हुई काफी पीकर यह ग्यान भी जगा कि अरे अग्यानी , अगर इशारा तेरी तरफ है तो जाहिर है तुझसे ब्लाग लिखना भी अपेक्षित है.
तो इस बात को इग्नोर करते हुए कि हम चने की झाड में चढाये जाने वाले शास्त्रीय दांव में फंसा दिये गये हैं हमने सोचा कि चलो लिख ही डालते हैं. हमारे आलसीपने की छवि का हमको यह सहारा तो था कि फुरसतिया को आभास भी नहीं होगा कि हम लिख रहे हैं. विद्वान इसी तरह के इवेंट को किसी अग्यात पापड वाले को मारना बतलाते हैं.

बडे लस्सू किस्म के प्राणी हैं शुकुल. मिलो तो फीजिकली लसते हैं और न जाओ तो दिल और दिमाग के अंदर अपने लिक्खाडपने के कारण. मेरे ख्याल से आसपास के मुहल्ले से लेकर शहरों तक कोई ऐसा कवि, कथाकार, साहित्यकार नहीं बचा होगा जहां यह चिट्ठाकार अपनी कार से न पहुंच गया होगा.

कई चिट्ठाकारों द्वारा गुरुदेव के नाम से संबोधित यह गुरुघंटाल घंटी (साइकिल वाली) बजाते हुए भारत-यात्रा कर चुका है, यह शायद कम लोगों को मालूम होगा.

बनाने वाले का कम्प्यूटर क्रैश हो गया होगा (कम्प्यूटर लैंगुएज 'सी' की भाषा में कोर डम्प) ऐसे प्राणी को रचकर. शुकुल जसपाल भट्टी के वह ट्रैजिक एपिसोड हैं जिसका चयन पुरस्कार के लिये कामेडी की श्रेणी में हुआ हो.

खिंचाई को शुकुल ने कुटीर उद्योग का दर्जा दिला दिया है. हमें पता है कि कई ब्लागर बेताब हो रहे होंगे, शुकुल से अपनी खिंचाई करवाने को. इसके पहले लोगों को शायद पता भी नहीं होगा कि खिंचाई करवाने में भी इतना आनंद आता है. बकौल एक भुक्तभोगी - पहले तो थोडी तकलीफ होती है, धीरे-धीरे मजा आने लगता है.

'माई री वा मुख की मुसकान संभारी न जैहें न जैंहे' लिख्नने वाले रसखान बतायें कि जिस मुख में सदा खीसें निपोरी रहती हैं, कितने समंद की मसि लें और कितने ग्रहों की धरती को कागद करें इसको बखानने में?

तो शुकुल दिवस पर यही कामना है कि वह दिन-पर-दिन इसी तरह बसियाते रहें जिससे इनकी चावल वाली महक, दारू वाली मस्ती और अचार का चटपटापन न केवल बरकरार रहे बल्कि बढता भी रहे.

Tuesday, August 23, 2005

हामिद का चिमटा बनाम हैरी की झाड़ू

बहुत तर्क वितर्क के बाण चले. हम भी सोच रहे थे कि हमसे कैसे रहा गया बिना कुछ किये.

इसी ऊहापोह में दिन गुजरते जा रहे थे कि 'यदा यदा हि धर्मस्य' वाली शैली में चौबे जी अपनी रिमोट से लाक होने वाली गाड़ी में प्रकट हुए. चौबे जी जब अपनी गाड़ी से उतरकर दरवाजे बंद करते हैं और फिर आगे बढ़ते हुए फिर गाड़ी की तरफ बिना देखे और पीठ किये हुए रिमोट से दरवाजा लाक करते हैं तो उस समय चौबाइन के चेहरे पर देवदास की ऐश्वर्या का 'इश्श' वाला भाव परिलक्षित होता है.चौबे जी लाख दाबने पर भी इस इश्टाइल की प्रतिक्रिया स्वरूप उभरने वाली मुसकी
नहीं रोक पाते


अब चौबे जी आते हैं तो आते हैं. फिर और कोई घटना, व्यक्ति या स्थान जो है उतने महत्व के लायक नहीं रह जाते.

पत्नी चाय बनाने लगती है क्योंकि चौबे जी आये हैं, बेटे को धूम मचाने की आज़ादी मिल जाती है क्योंकि चौबे जी आये हैं, हम सेल्फ- कांशस हो जाते हैं कि चौबे जी आये हैं.

चौबे जी बैठते हैं. चौबे जी बैठते हैं तो बैठते हैं. सोफे का सबसे आरामदेह हिस्सा अतिक्रमण करके, एक दो तकिये ऊपर से मंगा कर, आसपास अखबारों और पत्रिकाओं को तौहीन की नज़र से देख कर, पूरे घर को विशेषज्ञ दृष्टि से घूरकर फिर फाइनली ठंस कर बैटते हैं.
टीवी के सामने से कोई निकल नहीं सकता क्योंकि चौबेजी बैठे हैं. चाय के साथ समोसे तले जा रहे हैं क्योंकि चौबे जी बैठे हैं. लैपटाप पर बिहार के समाचार देखे जा रहे हैं क्योंकि चौबेजी बैठे हैं.


तो चौबे जी को भी हमने ब्लाग जगत में होने वाले शास्त्रार्थ का आंखों पढ़ा हाल सुनाया और ज़िद की उनकी प्रतिक्रिया जानने की.
चौबाइन ने बीच में झाड़ू और चिमटे की बात सुन उत्सुकावस्था में कान वैसे ही फड़फड़ाये जैसे अर्जुन के सामने गांडीव या कृष्ण के समक्ष सुदर्शन की या नानी के आगे नेनौरे (ननिहाल) की बातें हो रही हों, ज़रा देर तक उन्होंने दरशाया कि बात उनके अधिकारक्षेत्र की है और वहीं तक रहे तो बेहतर, फिर 'नासपीटे कहीं के' जैसाकुछ भाव फेंककर किचनोन्मुख हुईं.

हम - अब देखिये ना हैरी पाटर इंस्टैंट क्लासिक मान लिया गया है
चौबे जी - अब क्लासिक भी कोई नूडल होता है कि लिखा और २ मिनट में पब्लिक में अनाउंसमेंट कि लो भैया आ गया बाजार में गरम-गरम.

हम थोड़ा असंतुष्ट गतिविधियों में लगे, मिनमिनाये -
देखिये लोगों ने खरीदा तो है ८०० रु. में बाज़ार से. ऐसे थोड़े ही हल्ला हो जाता है.

चौबे जी हंसे और इस प्रकार हम डायरेक्ट गाली खाने से बचे.
बोले - कौन खरीदा है ८०० रु. में. हमरे गांव में नगेसर जादव का लड़का
का? अरे खरीदा तो ओही लोग है ना. आई टी या फिर २४००० डैश १२५० डैश १३४५ डैश २९००० वाले ग्रेडवा वालों का लड़का का या फिर मैकडोनाल्ड में खाने वाला शहराती लोग?

हम अब अटैकिंग मोड में आते हुए बोले - अब आप हामिद का चिमटा इतना बिकवा के देखिये, ई सब ब्लागर लोग का चैलेंज है!

चौबेजी चकाचक चाय-चुस्की लेकर चौकस हो चुके थे. इस बाउंसर को दूसरी चुस्की की फूंक से उड़ाया और कहा - बचवा, ई सब है बजारवाद का दंभ. चलो अब हम बाजारू भाषा ही उवाचेंगे. माल तो पता लगा कि बिकाऊ है, रिन की तरह टिकाऊ है कि नहीं? क्लासिकवा ऐसे ही टेस्ट होता है. ई सब हैरी - वैरी ५-६ साल बाद कोई पूछे तब हमरे पास आना और अब तक जितने चाय-समोसे खिलाये हैं ऊ सब सूद समेत ले जाना. बजार का तो काम है जरूरत बनाना और जरूरत को कैश करके बेंच खाना. साबुन इसलिये खरीदो कि फलाने की कमीज हमसे कैसे ज्यादा सफेद, हमसे ज्यादा कैसे? टीवी लो तो इसलिये कि नेबरवा का एन्वी पहिले हो और ओनरवा का प्राइड बाद में.


हमने भी पाकिस्तानी सेना की तरह उधारी वाले अस्त्रों का सहारा नहीं छोड़ा. हम बोले -
तो क्या आपको नहीं लगता कि ये कहानी नैतिकवादी घोर और इसलिये बोर है?क्या हामिद का त्याग गिल्ट की फिलिंग नहीं पैदा करता?

चौबेजी लग रहा था इसी प्रश्न के इंतज़ार में थे, बोले- तो ई कहनिया में कौन सा लंगोट कसने या ब्रह्मचर्य आश्रम के पालन करने के ऊपर गीताप्रेस टाइप की बात कही गयी है?
इसमें तो जीवन में सचमुच घट सकने वाली बात बाल मनोविज्ञान में उतरकर मनोरंजक ढंग से कही गयी है. इसमें कोई पलायनवाद का छौंक नहीं है. हामिद के तर्क बच्चों को सीधे और बड़ों को बच्चे के माध्यम से गुदगुदाते हैं.साथ ही सिखलाते हैं अपनी चदरिया की लेंथ और पैर पसारने का अनुपात. और ई काम हमिदवा ठंस के करता है. नैतिकतावादी होता या प्रवचन देने वाला होता तो कहता कि गरीब की गरीबी का मजाक उड़ाना पाप है. ऊपर वाला सब देख रहा है. उससे डरो. या हे प्रभो, ई मूरख लोग ई नहीं जानता कि क्या कर रहा है तो इनको हो सके तो माफ किया जाय. या फिर पुरानी हिंदी फिल्मों के हीरो की तरह सूखे पेड़ के नीचे खड़ा होकर बिसूरता नहीं कि 'ए दुनिया के रखवाले' या 'अरे ओ रोशनी वालों'.

उसकी एही बतिया सिखाती है कि शादी में मारुति काहे नहीं लो और बच्चे की हर मांग पूरी कर पाने की सामर्थ्य ना होने पर गिल्टवा काहे नहीं पालो.

अगर ई कहनिया गिल्ट पैदा करती है तो क्या करें हम? और क्या करे हमिदवा?हम ओही घिसा-पिटा डायलगवा फिर से मारूंगा कि सारी कहानियां ऐसी लिखी जायें जो गिल्ट पैदा करें कि हाय-हाय हम ऐसे काहे नहीं बन पाये?

गुप्त जी जो कविता में कहते हैं कि माया के गर्भ से बुद्ध पैदा होता है और हर डाकू तरक्की कर के वाल्मीकि बनने के सपने देखता है, आगे लिखते हैं कि स्वतंत्रता हो तो हमिदवा चुनेगा हैरी पाटर ही.


तो ई गड़बड़ रमायन हमसे सुनो जो गिल्ट पैदा न करे. हमिदवा जा रहा है मेला. हैरी पाटर खरीदनी है और जेबवा में उतना पैसा नहीं है. तो क्या करे? बालमन! इक साथी की जेब से पैसे गिर जाते हैं, हमिदवा की जेब में पैसे पहुंच गये चुपके से. मेले में दूसरे मित्र की चापलूसी करके उसके पैसे की मिठाई खाता है तीसरे मित्र को आंख मारते हुए कि देखा कैसा फंसाया. पैसे अभी भी कम हैं, चौथे से उधार लेता है और लो हैरी पाटर आ गयी.

जैसे उनके दिन बहुरे तैसे सबके दिन बहुरें ! कहानी खतम, बच्चा लोग बजाओ ताली और घर जाकर खुश हो कि देखो हम कितने अच्छे बच्चे हैं. मिठाई हम भी चापलूसी करके खाते हैं पर आंख तो नही मारते. और उधार लेकर हम भी नाइकी के जूते खरीद लाते हैं लेकिन हम कह आते हैं कि ई उधार हम चुकायेंगे. सारा गिल्ट हमिदवा के हिस्से गया. बिरबलवा की तरह अपने चरित्र की लइनिया बड़ा नहीं हुआ तो दूसरे का चरित्र की लइनिया छोटा कर आये.

और दूसरी बतिया ये भी सुनो,इस कहानी के हैरी से भी लेखिका पैसे न होने पर हैरी पाटर न खरिदवाती.न भरोसा हो तो पहमे भाग में उसके कजिनवा का बर्थडे में देख लो. जो कहता है कि पिछला बर्थडे में छत्तीस गिफ्ट दिये थे, इस बार पैंतीसे दिये. तो हम दर्शक इसे बालमन का हठ मानकर का इग्नोर किये? हमलोग उसकी इस बात को दुष्टता मानकर मुस्कुराये. और हमरा छुटका ,जो कैंडी खाने को लेकर जब तब महाभारत मचाये रहता है ,तक 'हाऊ मीन' बोला.

और छुटके को स्वतंत्रता मिले तो सारे मास्टरों को स्कूल में नौकरी से निकाल दे और लंच में सिर्फ चाकलेट खिलवाये. और हमको मिले स्वतंत्रता तो हम ससुरे कृष्णनवा को दुई कंटाप लगायें जो हमको एक्जाम में टोपने नहीं दिया और जिसमें हमने सप्ली खायी थी.

सो ई गिल्ट वाली बतिया और ई डायलाग कि 'जमाने ने उसे कल्लू से कालिया बना दिया' में ज्यादा फरक नहीं है. ई सब है गड़बड़ का ग्लोरिफिकेसन.

अब तक हम भी शहीदी मुद्रा में आ चुके थे, बोले - तो क्या ई कितबिया बिलकुल चौपट है?

चौबे जी आखिरी समोसा टूंगते हुए और अपनी बातों में डिसक्लेमर (जैसा दोनों पक्ष के ब्लागर भी चिपका चुके हैं
)ठांसते हुए बोले - ई तो हम बोले नहीं, जबरदस्तिये हमरे मुंह में समोसे जैसा ठूंसे दे रहे हो. कितबिया मजेदार है, फिलम और भी जिसमें तकनीक के कमाल से सब चकाचक देखाया है, पढ़िये, देखिये , और इंजाय कीजिये. बकिया हम जो कह रहे थे कि स्वस्थ मनोरंजन और सिर्फ मनोरंजन के बीच में जो लाइन है ऊ तो रहबे करेगा. हम तो छोटका को कैंडी
खिलाते हैं , पर रोटी - दाल को रिप्लेस तो नहीं न करते हैं. जरूरत पड़ने पर दवा देते हैं तो उसको समझ लो प्रवचन!

अब हम हार कैसे मान लेते .अपनी ठंडी चाय सारी सुड़क गये फिर बोले - देखिये, लेकिन फिर भी लोग तो चिमटा इतना नहीं खरीदते हैं.

चौबे जी मंद-मंद मुसकाये. बोले - कभी स्टेशन में देखा है कि कौन पत्रिका घमंड से क्लेम करती है 'भारत की सर्वाधिक बिकने वाली पत्रिका'? दुनिया में सिगरेट और शराब ज्यादा बिकते हैं कि फल? लेकिन सभी कोई न कोई जरूरत पूरी करते हैं.

इन सबको अपने रेशियो में यूज करना चाहिये, सब्जी में मिरचा डालते हैं, मिरचा में सब्जी नहीं, ई समझ के काम करना चाहिये. रेशियो के साथ टाइम भी बेटाइम नहियै होना चाहिये. जैसे दिशा- मैदान और भोजन दोनों जरूरी है, लेकिन दिशामैदान के समय आप सब्जी की चटखारेदार चर्चा नहीं कर सकते और भाइसे भर्सा सब्जी खाते समय भी. रमायन और सेक्स की बात और स्वाद भी इसीलिये अलग-अलग है, बकिया भूल-चूक लेनी देनी. अब हम जा रहे हैं.

कपप्लेट और समोसे की खाली तश्तरियां फैली हैं क्योंकि चौबेजी चले गये हैं. हम लैपटाप परबैठे हैं कि चौबेजी चले गये हैं.

Wednesday, March 16, 2005

बचपन के मेरे मीत

Akshargram Anugunj

हम कलकत्ते में रहने वाले अपने ममेरे भाई से फोन पर बतिया रहे थे. अचानक वह बोला - लीजिये लल्ला बाबा से बात कीजिये और जब तक हम संभलें फोन लल्ला बाबा के कब्ज़े में था.

लल्ला बाबा उवाचे - आलो (यानी हलो, ये लल्ला बाबा का यूनीक इश्टाइल है)
हमने भी हलो किया और पूछा - क्या खबर है लालदेव?
पूरी बातचीत में हाल-चाल लिये कम, लल्ला बाबा की डिमांड पर सुनाये ज्यादा. जब घर भर के बारे में तसल्ली ले ली, जान लिया हमारी भारत यात्रा के बारे में, तब वे बोले - बहुत बात कर ली, अब फोन रखो. हम सिर्फ इतना ही पूछ पाये थे - लल्ला, कहीं विवाह की बातचीत चल रही है तुम्हारी? लेकिन फोन तब तक कट गया था.


ऐसी किंवदंती है कि लल्ला बाबा हमसे सिर्फ १५ दिन बड़े हैं लेकिन इन १५ दिनों के फरक ने लल्ला अर्थात विनय कुमार शुक्ल के साथ १५ से ज्यादा विशेषण लगा दिये हैं. गाँव के रिश्ते से इनके पिताजी हमारे मामाओं के नाना लगते हैं, इस लिहाज से लल्ला हमारे मामा के भी मामा (मामा स्क्वायर) हैं, ममेरे भाइयों के लल्ला बाबा हैं, हमारे लल्ला नाना हैं. पोस्ता (जोड़ाबगान का एक व्यावसायिक केन्द्र) में लल्ला बाबू हैं. चूँकि बहुमत लल्ला बाबा कहने वालों का है, इसलिये लल्ला बाबा ही सबसे लोकप्रिय नाम है.

स्ट्रैंड रोड पर जिस मकान में हम रहते थे वहाँ से बाहर नकल कर दाँये जाकर पहली गली में दाँये घूम जाओ, एक इस्तिरी वाला मिलेगा और उसके बाद जो बाँयी तरफ पाँच तल्ले (मंज़िल) का मकान है, उसी में तीन तल्ले पर लल्ला बाबा अपने पिताजी और बड़े भाई के साथ रहते हैं (थे - इसी बार पता चला कि लल्ला बाबा शिफ्ट कर गये हैं वहाँ से)

जहाँ तक हमें याद है हम लोगों ने छोटी कक्षाओं में पढ़ाई एक साथ ही शुरू की थी. साथ - साथ ही स्कूल जाते थे. लल्ला बाबा हमारे परिवार के ही सदस्य थे और अभी तक हैं. ट्यूशन भी साथ -साथ पढ़ते थे.

लल्ला बाबा कूल लोगों में से थे जो छुटपन से ही पान और पान-मसाला खाते थे और मुहल्ले का हर चायवाला, पनवाड़ी, मूड़ी (लैया) वाला, गन्ने के रस वाला, यहाँ तक मोड़ की मिठाई वाला तक उनको जानता था और श्रद्धा या सुविधानुसार उन्हें लाला, लल्ला बाबू, लाला बाबू पुकारता था. हम स्कूल एक साथ ही जाया करते थे. लल्ला बाबा आते-जाते गाय की पूँछ पकड़ कर लटक सकते थे, एकआध नेताछाप लोगों के साथ जीप या मोटरसाइकिल में घूम सकते थे, गली के लोफरनुमा लड़कों से दोस्ताना अंदाज़ में बातें कर सकते थे, यहाँ तक कंचे खेल सकते थे, पतंग खरीद कर उड़ सकते थे और लूट भी सकते थे. तात्पर्य यह कि लल्ला बाबा वह हर काम कर सकते थे जो कि हम पढ़ाई में तेज माने जाने की वजह से और अच्छे बच्चे होने की छवि का बोझ ढोने की वजह से नहीं कर सकते थे. इस तरह लल्ला बाबा हमलोगों के लिये वह खिड़की थे जो उस दुनिया की तरफ खुलती थी जो हमलोगों के लिये शायद निषिद्ध थी लेकिन लल्ला के स्वागत के लिये हमेशा पलक-पाँवड़े बिछाकर तैयार रहती थी.

हम उत्सुकतापूर्वक उनसे सुनते थे कि किस प्रकार नोना ने हाथ घुमाकर बम चलाया और पुलिस के आते ही बहादुरीपूर्वक छिप गया था. या कौन सा नया थाना इंचार्ज आया है जोड़ाबगान या बड़ाबाजार थाने में. लल्ला हमें गर्व भरी निगाह से हमें देखते हुए ट्राफिक कांस्टेबल से जाकर टाइम पूछ सकते थे.

लल्ला बाबा हमारे लिये शुरू से ही बड़े प्रोटेक्टिव थे. हम बचपन में लल्ला बाबा के साथ किसी पान की दुकान में खड़े थे कि उनके दो सड़कछाप मित्र आ गये फिल्मी अंदाज़ मे बड़े बाल, शर्ट की बटनें खुली हुई. एक तो लल्ला के साथ बातें करने लगा, दूसरा बोर होकर हमसे पूछने लगा कि यहाँ पास वाले कन्या विद्यालय में छुट्टी कब होती है. लल्ला की भौहें टेढ़ी हुईं, बोले - ए स्साला, तुम उससे ई सब बात नहीं करेगा, ऊ पढ़ने वाला लड़कालोग है, थोड़ा आदमी चीन्हके बात किया कर!
वह मित्र बोला - अरे हम कुछ अइसा- वइसा नहीं बोला, (हमसे), बोलो हम कुछ बोला क्या?
लल्ला पर इसका कोई असर नहीं पड़ा, बोले - ऊ सब हमको बताने का दरकार नहीं, आगे से हमसे बात करेगा ई सब.

हमारे बचपन में कांग्रेस का शासन था. सो सरकार और पार्टी लल्ला बाबा की प्रतिभा पल्लवित होते देख रही थी. कभी-कभी चुनाव प्रचार में भी आने-जाने लगे थे और इस तरह उनकी श्रद्धा का ग्राफ दिन दूना और रात चौगुना ऊपर जा रहा था.

लल्ला बाबा छुटपन से ही ज़िन्दगी का मर्म समझ चुके थे और हमें बतला चुके थे कि ई पढ़ाई - लिखाई से मिला है का कुछ भी किसी को. उस ज़माने में जब हमें स्कूल को मंदिर बताया गया था और पढ़ाई को सरस्वती, उनकी ऐसी विद्रोही बातें तो हमारा सिस्टम क्रैश कर देती थीं.
हमलोग दूसरी-तीसरी कक्षा से साथ ही ट्यूशन पढ़ते थे. हमारे ट्यूटर बनारस की तरफ से थे और उनका नाम भी श्री लल्ला चौबे था. उन्हें अपने नाम और शिक्षा से बड़ा प्रेम था. लेकिन लल्ला बाबा को पढ़ाने के समय उनके सामने पहचान का संकट उपस्थित हो जाता था और शायद इस वजह से ही वह भी लल्ला बाबा को हर दो-चार दिनों में पीटने का बहाना खोज लेते थे.

जैसा हम बता चुके हैं हमने पढ़ना साथ -साथ शुरू किया था और शुरुआती कुछ सालों तक हम साथ-साथ रहे. स्कूल वाले भी जी कड़ा करके लल्ला बाबा को हर साल खिसकाते रहे. लेकिन एक बार जब हम और लल्ला बाबा पाँचवीं का सालाना इम्तिहान दे चुके तो परिणामों की घोषणा से पहले प्रधानाचार्य ने लल्ला के पिताजी से बात की कुछ यों -
शुक्लाजी, विनय का प्रोमोशन तो बहुत मुश्किल है अगली कक्षा के लिये तो.
लल्ला के पिताजी तो एक क्षण के लिये सोच में पड़े फिर बोले - तो ठीक है आप जैसा समझें, न करें प्रोमोशन.
प्रधानाचार्य खँखारते हुए और थोड़ा हकलाते हुए बोले- नहीं, आप बात समझ नहीं रहे हैं, पाँचवीं कक्षा में नहीं फिट होगा ये.
लल्ला के पिताजी थोड़ा कनफुजिया गये, बोले - अभी तो आप कह रहे थे कि प्रोमोशन नही करेंगे!
प्रधानाचार्य जी ने कहने से पहले अपनी बात को तौला फिर बोले - मैं ये कह रहा था कि इसे चौथी कक्षा में डाल दिया जाय तो?
पढ़े-लिखे लोगों का तब से लल्ला बाबा की नज़रों में और पतन हो गया था. तब से याद नहीं कि लल्ला बाबा का स्कूल जाना कैसे कम होता गया, लेकिन एक बार हमने बैठ के सोचा तो पाया कि लल्ला बाबा अब स्कूल का रास्ता छोड़ चुके हैं.

अब भी हर फंक्शन लल्ला बाबा के बिना अधूरा है, हर आयोजन लल्ला की सलाह से किया जाता है. कोई भी काम कहीं भी अटका हो लल्ला बाबा ही आखिरि शरण हैं, चाहे टिकट रिजर्व कराना हो, बड़ाबाजार से कपड़े खरीदने हों, किसी के बारे में जानकारी प्राप्त करनी हो या पुलिस केस फंसा हो या हावड़ा स्टेशन से रात-बिरात किसी को चढ़ाना-उतारना हो, एकबार चिंता लल्ला बाबा के सामने प्रस्तुत कर दो. बस, अब तो चिंता लल्ला बाबा की है.

लल्ला बस खुश एक ही चीज़ से हो सकते हैं. हर काम के बाद या बहुत दिनों के बाद मिलने पर जब उनका हाथ प्रश्नवाचक मुद्रा में घूमता है और वही चिरंतन प्रश्न उनके मुखमंडल से फूटता है - क्या इंतज़ाम है? तो इसका मतलब होता है कि सोमरस का समय हो गया है.

एक बात और कि लल्ला बाबा को नियंत्रण खोते हुए भी नहीं देखा गया सिवाय एकबार के जिसके हम चश्मदीद गवाह हैं.
तब की घटना का असर कुछ दिनों पहले तब दिखा, जब आशू (हमारे ममेरे भाई) ने कालेज के होमवर्क की प्राब्लम हल करते-करते गलती कर दी और उसके मुँह से निकला - हत्तेरे की. वह यह भूल गया कि लल्ला बाबा भी वहीं बैठे हैं. उसने लाख समझाया कि उसने जानबूझकर ऐसा नहीं किया पर लल्ला बाबा मानने को तैयार ही नहीं हुए. उसे जो हड़काया कि वह अभी भी याद करता है.

लल्ला बाबा की उस घटना को मन को व्यवस्थित करके सब ब्लागरगण सुनें.

हम तीसरी या चौथी कक्षा में होंगे और साथ ही स्कूल से लौट रहे थे. लल्ला बाबा की चाल में और दिनों की अपेक्षा अप्रत्याशित तेजी थी और किसी पानवाले, चायवाले के नमस्कार का जवाब नहीं दे रहे थे. हमलोग मामले की नज़ाकत समझ चुके थे और हमलोग भी तेज ही चल रहे थे कि घर से कुछ १ फर्लांग दूर अचानक लल्ला बाबा ने माथे पर जोर से हाथ दे मारे और उनके मुँह से निकला - हत्तेरे की.
यानी अनहोनी हो गयी थी, विज्ञान के गुरुत्वाकर्षण, द्रव के अपना तल ढूँढ लेने के सिद्धांत, दबाव और बल के आगे लल्ला हार बैठे. कहा भी है-
पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान.


सो समय ने अपना खेल दिखाया और कुछ क्षणों की नज़ाकत ने लल्ला बाबा के रथ को जो उनके तेज से हमेशा ज़मीन से ३ इंच ऊपर चला करता था, ज़मीन पर ही ला धरा.


तो अगली बार अगर आप लल्ला बाबा से मिलें तो याद रखियेगा, 'क्या इंतज़ाम है?' का जवाब तैयार होना चाहिये.