Tuesday, August 23, 2005

हामिद का चिमटा बनाम हैरी की झाड़ू

बहुत तर्क वितर्क के बाण चले. हम भी सोच रहे थे कि हमसे कैसे रहा गया बिना कुछ किये.

इसी ऊहापोह में दिन गुजरते जा रहे थे कि 'यदा यदा हि धर्मस्य' वाली शैली में चौबे जी अपनी रिमोट से लाक होने वाली गाड़ी में प्रकट हुए. चौबे जी जब अपनी गाड़ी से उतरकर दरवाजे बंद करते हैं और फिर आगे बढ़ते हुए फिर गाड़ी की तरफ बिना देखे और पीठ किये हुए रिमोट से दरवाजा लाक करते हैं तो उस समय चौबाइन के चेहरे पर देवदास की ऐश्वर्या का 'इश्श' वाला भाव परिलक्षित होता है.चौबे जी लाख दाबने पर भी इस इश्टाइल की प्रतिक्रिया स्वरूप उभरने वाली मुसकी
नहीं रोक पाते


अब चौबे जी आते हैं तो आते हैं. फिर और कोई घटना, व्यक्ति या स्थान जो है उतने महत्व के लायक नहीं रह जाते.

पत्नी चाय बनाने लगती है क्योंकि चौबे जी आये हैं, बेटे को धूम मचाने की आज़ादी मिल जाती है क्योंकि चौबे जी आये हैं, हम सेल्फ- कांशस हो जाते हैं कि चौबे जी आये हैं.

चौबे जी बैठते हैं. चौबे जी बैठते हैं तो बैठते हैं. सोफे का सबसे आरामदेह हिस्सा अतिक्रमण करके, एक दो तकिये ऊपर से मंगा कर, आसपास अखबारों और पत्रिकाओं को तौहीन की नज़र से देख कर, पूरे घर को विशेषज्ञ दृष्टि से घूरकर फिर फाइनली ठंस कर बैटते हैं.
टीवी के सामने से कोई निकल नहीं सकता क्योंकि चौबेजी बैठे हैं. चाय के साथ समोसे तले जा रहे हैं क्योंकि चौबे जी बैठे हैं. लैपटाप पर बिहार के समाचार देखे जा रहे हैं क्योंकि चौबेजी बैठे हैं.


तो चौबे जी को भी हमने ब्लाग जगत में होने वाले शास्त्रार्थ का आंखों पढ़ा हाल सुनाया और ज़िद की उनकी प्रतिक्रिया जानने की.
चौबाइन ने बीच में झाड़ू और चिमटे की बात सुन उत्सुकावस्था में कान वैसे ही फड़फड़ाये जैसे अर्जुन के सामने गांडीव या कृष्ण के समक्ष सुदर्शन की या नानी के आगे नेनौरे (ननिहाल) की बातें हो रही हों, ज़रा देर तक उन्होंने दरशाया कि बात उनके अधिकारक्षेत्र की है और वहीं तक रहे तो बेहतर, फिर 'नासपीटे कहीं के' जैसाकुछ भाव फेंककर किचनोन्मुख हुईं.

हम - अब देखिये ना हैरी पाटर इंस्टैंट क्लासिक मान लिया गया है
चौबे जी - अब क्लासिक भी कोई नूडल होता है कि लिखा और २ मिनट में पब्लिक में अनाउंसमेंट कि लो भैया आ गया बाजार में गरम-गरम.

हम थोड़ा असंतुष्ट गतिविधियों में लगे, मिनमिनाये -
देखिये लोगों ने खरीदा तो है ८०० रु. में बाज़ार से. ऐसे थोड़े ही हल्ला हो जाता है.

चौबे जी हंसे और इस प्रकार हम डायरेक्ट गाली खाने से बचे.
बोले - कौन खरीदा है ८०० रु. में. हमरे गांव में नगेसर जादव का लड़का
का? अरे खरीदा तो ओही लोग है ना. आई टी या फिर २४००० डैश १२५० डैश १३४५ डैश २९००० वाले ग्रेडवा वालों का लड़का का या फिर मैकडोनाल्ड में खाने वाला शहराती लोग?

हम अब अटैकिंग मोड में आते हुए बोले - अब आप हामिद का चिमटा इतना बिकवा के देखिये, ई सब ब्लागर लोग का चैलेंज है!

चौबेजी चकाचक चाय-चुस्की लेकर चौकस हो चुके थे. इस बाउंसर को दूसरी चुस्की की फूंक से उड़ाया और कहा - बचवा, ई सब है बजारवाद का दंभ. चलो अब हम बाजारू भाषा ही उवाचेंगे. माल तो पता लगा कि बिकाऊ है, रिन की तरह टिकाऊ है कि नहीं? क्लासिकवा ऐसे ही टेस्ट होता है. ई सब हैरी - वैरी ५-६ साल बाद कोई पूछे तब हमरे पास आना और अब तक जितने चाय-समोसे खिलाये हैं ऊ सब सूद समेत ले जाना. बजार का तो काम है जरूरत बनाना और जरूरत को कैश करके बेंच खाना. साबुन इसलिये खरीदो कि फलाने की कमीज हमसे कैसे ज्यादा सफेद, हमसे ज्यादा कैसे? टीवी लो तो इसलिये कि नेबरवा का एन्वी पहिले हो और ओनरवा का प्राइड बाद में.


हमने भी पाकिस्तानी सेना की तरह उधारी वाले अस्त्रों का सहारा नहीं छोड़ा. हम बोले -
तो क्या आपको नहीं लगता कि ये कहानी नैतिकवादी घोर और इसलिये बोर है?क्या हामिद का त्याग गिल्ट की फिलिंग नहीं पैदा करता?

चौबेजी लग रहा था इसी प्रश्न के इंतज़ार में थे, बोले- तो ई कहनिया में कौन सा लंगोट कसने या ब्रह्मचर्य आश्रम के पालन करने के ऊपर गीताप्रेस टाइप की बात कही गयी है?
इसमें तो जीवन में सचमुच घट सकने वाली बात बाल मनोविज्ञान में उतरकर मनोरंजक ढंग से कही गयी है. इसमें कोई पलायनवाद का छौंक नहीं है. हामिद के तर्क बच्चों को सीधे और बड़ों को बच्चे के माध्यम से गुदगुदाते हैं.साथ ही सिखलाते हैं अपनी चदरिया की लेंथ और पैर पसारने का अनुपात. और ई काम हमिदवा ठंस के करता है. नैतिकतावादी होता या प्रवचन देने वाला होता तो कहता कि गरीब की गरीबी का मजाक उड़ाना पाप है. ऊपर वाला सब देख रहा है. उससे डरो. या हे प्रभो, ई मूरख लोग ई नहीं जानता कि क्या कर रहा है तो इनको हो सके तो माफ किया जाय. या फिर पुरानी हिंदी फिल्मों के हीरो की तरह सूखे पेड़ के नीचे खड़ा होकर बिसूरता नहीं कि 'ए दुनिया के रखवाले' या 'अरे ओ रोशनी वालों'.

उसकी एही बतिया सिखाती है कि शादी में मारुति काहे नहीं लो और बच्चे की हर मांग पूरी कर पाने की सामर्थ्य ना होने पर गिल्टवा काहे नहीं पालो.

अगर ई कहनिया गिल्ट पैदा करती है तो क्या करें हम? और क्या करे हमिदवा?हम ओही घिसा-पिटा डायलगवा फिर से मारूंगा कि सारी कहानियां ऐसी लिखी जायें जो गिल्ट पैदा करें कि हाय-हाय हम ऐसे काहे नहीं बन पाये?

गुप्त जी जो कविता में कहते हैं कि माया के गर्भ से बुद्ध पैदा होता है और हर डाकू तरक्की कर के वाल्मीकि बनने के सपने देखता है, आगे लिखते हैं कि स्वतंत्रता हो तो हमिदवा चुनेगा हैरी पाटर ही.


तो ई गड़बड़ रमायन हमसे सुनो जो गिल्ट पैदा न करे. हमिदवा जा रहा है मेला. हैरी पाटर खरीदनी है और जेबवा में उतना पैसा नहीं है. तो क्या करे? बालमन! इक साथी की जेब से पैसे गिर जाते हैं, हमिदवा की जेब में पैसे पहुंच गये चुपके से. मेले में दूसरे मित्र की चापलूसी करके उसके पैसे की मिठाई खाता है तीसरे मित्र को आंख मारते हुए कि देखा कैसा फंसाया. पैसे अभी भी कम हैं, चौथे से उधार लेता है और लो हैरी पाटर आ गयी.

जैसे उनके दिन बहुरे तैसे सबके दिन बहुरें ! कहानी खतम, बच्चा लोग बजाओ ताली और घर जाकर खुश हो कि देखो हम कितने अच्छे बच्चे हैं. मिठाई हम भी चापलूसी करके खाते हैं पर आंख तो नही मारते. और उधार लेकर हम भी नाइकी के जूते खरीद लाते हैं लेकिन हम कह आते हैं कि ई उधार हम चुकायेंगे. सारा गिल्ट हमिदवा के हिस्से गया. बिरबलवा की तरह अपने चरित्र की लइनिया बड़ा नहीं हुआ तो दूसरे का चरित्र की लइनिया छोटा कर आये.

और दूसरी बतिया ये भी सुनो,इस कहानी के हैरी से भी लेखिका पैसे न होने पर हैरी पाटर न खरिदवाती.न भरोसा हो तो पहमे भाग में उसके कजिनवा का बर्थडे में देख लो. जो कहता है कि पिछला बर्थडे में छत्तीस गिफ्ट दिये थे, इस बार पैंतीसे दिये. तो हम दर्शक इसे बालमन का हठ मानकर का इग्नोर किये? हमलोग उसकी इस बात को दुष्टता मानकर मुस्कुराये. और हमरा छुटका ,जो कैंडी खाने को लेकर जब तब महाभारत मचाये रहता है ,तक 'हाऊ मीन' बोला.

और छुटके को स्वतंत्रता मिले तो सारे मास्टरों को स्कूल में नौकरी से निकाल दे और लंच में सिर्फ चाकलेट खिलवाये. और हमको मिले स्वतंत्रता तो हम ससुरे कृष्णनवा को दुई कंटाप लगायें जो हमको एक्जाम में टोपने नहीं दिया और जिसमें हमने सप्ली खायी थी.

सो ई गिल्ट वाली बतिया और ई डायलाग कि 'जमाने ने उसे कल्लू से कालिया बना दिया' में ज्यादा फरक नहीं है. ई सब है गड़बड़ का ग्लोरिफिकेसन.

अब तक हम भी शहीदी मुद्रा में आ चुके थे, बोले - तो क्या ई कितबिया बिलकुल चौपट है?

चौबे जी आखिरी समोसा टूंगते हुए और अपनी बातों में डिसक्लेमर (जैसा दोनों पक्ष के ब्लागर भी चिपका चुके हैं
)ठांसते हुए बोले - ई तो हम बोले नहीं, जबरदस्तिये हमरे मुंह में समोसे जैसा ठूंसे दे रहे हो. कितबिया मजेदार है, फिलम और भी जिसमें तकनीक के कमाल से सब चकाचक देखाया है, पढ़िये, देखिये , और इंजाय कीजिये. बकिया हम जो कह रहे थे कि स्वस्थ मनोरंजन और सिर्फ मनोरंजन के बीच में जो लाइन है ऊ तो रहबे करेगा. हम तो छोटका को कैंडी
खिलाते हैं , पर रोटी - दाल को रिप्लेस तो नहीं न करते हैं. जरूरत पड़ने पर दवा देते हैं तो उसको समझ लो प्रवचन!

अब हम हार कैसे मान लेते .अपनी ठंडी चाय सारी सुड़क गये फिर बोले - देखिये, लेकिन फिर भी लोग तो चिमटा इतना नहीं खरीदते हैं.

चौबे जी मंद-मंद मुसकाये. बोले - कभी स्टेशन में देखा है कि कौन पत्रिका घमंड से क्लेम करती है 'भारत की सर्वाधिक बिकने वाली पत्रिका'? दुनिया में सिगरेट और शराब ज्यादा बिकते हैं कि फल? लेकिन सभी कोई न कोई जरूरत पूरी करते हैं.

इन सबको अपने रेशियो में यूज करना चाहिये, सब्जी में मिरचा डालते हैं, मिरचा में सब्जी नहीं, ई समझ के काम करना चाहिये. रेशियो के साथ टाइम भी बेटाइम नहियै होना चाहिये. जैसे दिशा- मैदान और भोजन दोनों जरूरी है, लेकिन दिशामैदान के समय आप सब्जी की चटखारेदार चर्चा नहीं कर सकते और भाइसे भर्सा सब्जी खाते समय भी. रमायन और सेक्स की बात और स्वाद भी इसीलिये अलग-अलग है, बकिया भूल-चूक लेनी देनी. अब हम जा रहे हैं.

कपप्लेट और समोसे की खाली तश्तरियां फैली हैं क्योंकि चौबेजी चले गये हैं. हम लैपटाप परबैठे हैं कि चौबेजी चले गये हैं.

12 comments:

Jitendra Chaudhary said...

आपके चौबे जी बहुतै ही क्लास आइटम है, गूढ गूढ बतिया को बहुत हल्के फुल्के तरीके मे समझाय रहे. अच्छा है चौबे जी का आपके यहाँ आना जाना बना रहे, ताकि चौबे जी आते रहे, और आप ब्लागियाते रहे.

बहुत दिनो बाद लौटे हो बन्धु, एक दो पोस्ट से काम नही चलेगा, एक महीना लगातार लिखो, तब जाकर कम्पनी ब्रेक इवेन प्वाइन्ट पर आयेगी.

अब बैठे बैठ का देख रहे हो, प्लेटे खाली ही रखोगे का?

Atul Arora said...

बहुत खूबसूरत लेख है और उतने ही रसिक चौबे जी आपके। हम सब तो ब्लागर मीट (ठेलुआ वर्जन) के इंतजार में मानीटर पर आँख गड़ाये कब से बैठे हैं।

अनूप शुक्ला said...

चौबेजी की कृपा बनी रहे तुम्हारे ऊपर। उन्हीं का आशीर्वाद बटोर के अतुल-जीतेन्द्र की मांग 'पूर' दो। बाकिया इंतजार के अलावा क्या है हमारे हाथ में!

अनूप शुक्ला said...

गद्य सौंदर्य-चौबेजी चकाचक चाय-चुस्की में अनुप्रास की छटा दर्शनीय है।

आशीष said...

का खूब लिक्खा है जनाब।

Kalicharan said...

likha to aise ki saare dubbe chaube chood ke chaabe ko hi mar diye ! padh ke mirchi wale samose imli ki chatni ke saath ka swaad hum ghar baithe hi paa liye.

इंद्र अवस्थी said...

pressure badhta ja rha hai. Isliye likhna padega.

zaldi heedekhenge bharat yatra blog par.

thanks to jitendra, atuland shukul pressue banaye rakhne ke liye.

इंद्र अवस्थी said...

कालीचरण जी, ये चौबे जी कभी छब्बे बनने के चक्कर में नहीं पड़े इसलिये चौबे रह गये, वरना तुमने तो देखा ही होगा बाकी लोगों को

राजेश कुमार सिंह said...

महामना ,
"कौन बनेगा करोड़पति" की तरह , पुनः उदय होने पर , स्वागत,बधाई,एवं शुभकामनाएँ।
"हैरी" व "हामिद" को ले कर यदि अगली "अनुगूँज" का आयोजन किया जाये , तो मेरे हिसाब से , यह सुविचार , अन्य सभी लोगों को , जो , आप की और मेरी तरह , यह सोचे रहे होंगे कि , उनसे आखिरकार कैसे रहा गया ? को अपनी बात कहने का एक उचित माध्यम होगा। क्या विचार है आप का ? (मतलब, अगर यदि यह "अनुगूँज" आयोजित हुई (आफ्टर द कन्सर्नड अप्रूवल) , तो आप को दुबारा लिखने का मन बनाना पड़ेगा।)
-राजेश

इंद्र अवस्थी said...

Dear Thakur,
This is little difficult request. Ek baar likhne mein hee apna dimaag ka halua ho jaata hai.

Waise badhai was accepted.

Anonymous said...

kya baat hai dada,
ummeed hai is baar chaube ji dube nahi banenge(arthaat aap agle lekh main adhik samay nahi lagaayenge).waise agar ye lekh JK Rowling padh le to agli pustak main cimte ka avtaar ho jaaega.LAGE RAHO INDIA LAGO RAHO.

Anonymous said...

hum monu hain.