Tuesday, October 12, 2004

एक कविता

कोयल की कूक

जब जगाये हृदय में हूक

समझ लेना निमंत्रण है मेरा

मौन मूक

7 Comments:

At 12 October 2004 10:34 PM , Blogger Jitendra Chaudhary said...

वाह वाह
क्या बात है...
जो बात इस छोटी सी कविता में है, वो बड़े बड़े चिट्ठो मे कहाँ.

लगे रहो मिंया......

 
At 13 October 2004 10:21 AM , Anonymous Anonymous said...

ई जापानी हायकू कविता है
इसके चक्कर में पडता कायकू?

या

कोयल रही है कूक
मन में उठी है हूक
'चौचक' खिली है धूप
भाड में गया निमंत्रण
चट से तुम उठो
पट से बना लाओ 'सूप'.

 
At 13 October 2004 10:34 AM , Blogger अनूप शुक्ला said...

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At 13 October 2004 10:39 AM , Anonymous Anonymous said...

ई जापानी कविता है हायकू
इसके चक्कर में पडता कायकू?

या
कोयल रही है कूक
मन में उठी है हूक
'चौचक' खिली है धूप
भाड में गया निमंत्रण
चट से तुम उठो
पट से बना लाओ 'सूप'.

 
At 13 October 2004 11:08 AM , Blogger इंद्र अवस्थी said...

कउन हौ तुम बेनाम,
तनिक बतलाया जाय नाम ।
नहीं तो हमीं पी जायेंगे सूप,
तुम सेंकते रह जाओगे धूप ।

 
At 14 October 2004 9:18 AM , Blogger अनूप शुक्ला said...

नाम-वाम में क्या रक्खा है
असल चीज है काम.
तुम नाम पूंछते रह जाओगे
यहां चला जायेगा घाम.

चला जायेगा घाम -
बहुत तुम तब पछताओगे.
'सूप'भला क्या पी पाओगे-
ठिठुरोगे,हाथ मसलते रह जाओगे.

'सूप'अभी तो समय लगेगा
चाय कडक मंगवायी है,
लपक के तुम भी आ जाओ
ये देखो कोयल भी कुकयायी है.

 
At 14 October 2004 11:16 PM , Blogger इंद्र अवस्थी said...

भाषा तो वही है बिलकुल,
लगते हो तुम हमको शुकुल।

अब जो अकेले पियोगे चाय
तो झेल न पाओगे हमारी हाय


अब जो तुमने किया है ये झाम
छोड़ के सारे काम धाम
खुद तो छाँही में बैठे हो
हमको दिखलाते हो घाम

अब न छाँटो ये लन्तरानी
चिरकुटई की है लंबी कहानी
टाइम बहुत हो गया अगर है
सो जाओ अब पीकर पानी

 

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