जन्म से कलकतिया, अभियांत्रिकी (कंप्यूटर साइंस) इलाहाबाद से, मूलत: उत्तर प्रदेश से. नौकरी और प्रोजेक्ट बड़ौदा, मुंबई, कलकत्ता, जमशेदपुर, लास एंजिलिस में करने के बाद वर्तमान में पोर्टलैंड, ओरेगन, संयुक्त राज्य में कार्यरत. जहाँ रहे प्रवासी माने गये, जैसे कलकत्ते में यूपी वाले, यूपी में बंगाली, बड़ौदा-मुंबई में श्रद्धानुसार भैया या बांग, अब यू. एस. में देसी या इंडियन. पंगा लेने की आदत नहीं,
लेकिन जहाँ भी रहे, ठँस के रहे, हर जगह अपना फच्चर फँसाते रहे. लोगों ने मौज ली तो हमने भी लोगों से मौज ली. बहरहाल हमको भी शिकायत का मौका नहीं मिला. शायद इसी स्थिति को प्राप्त होने को ठेलुहई कहते हैं.
7 Comments:
वाह वाह
क्या बात है...
जो बात इस छोटी सी कविता में है, वो बड़े बड़े चिट्ठो मे कहाँ.
लगे रहो मिंया......
ई जापानी हायकू कविता है
इसके चक्कर में पडता कायकू?
या
कोयल रही है कूक
मन में उठी है हूक
'चौचक' खिली है धूप
भाड में गया निमंत्रण
चट से तुम उठो
पट से बना लाओ 'सूप'.
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ई जापानी कविता है हायकू
इसके चक्कर में पडता कायकू?
या
कोयल रही है कूक
मन में उठी है हूक
'चौचक' खिली है धूप
भाड में गया निमंत्रण
चट से तुम उठो
पट से बना लाओ 'सूप'.
कउन हौ तुम बेनाम,
तनिक बतलाया जाय नाम ।
नहीं तो हमीं पी जायेंगे सूप,
तुम सेंकते रह जाओगे धूप ।
नाम-वाम में क्या रक्खा है
असल चीज है काम.
तुम नाम पूंछते रह जाओगे
यहां चला जायेगा घाम.
चला जायेगा घाम -
बहुत तुम तब पछताओगे.
'सूप'भला क्या पी पाओगे-
ठिठुरोगे,हाथ मसलते रह जाओगे.
'सूप'अभी तो समय लगेगा
चाय कडक मंगवायी है,
लपक के तुम भी आ जाओ
ये देखो कोयल भी कुकयायी है.
भाषा तो वही है बिलकुल,
लगते हो तुम हमको शुकुल।
अब जो अकेले पियोगे चाय
तो झेल न पाओगे हमारी हाय
अब जो तुमने किया है ये झाम
छोड़ के सारे काम धाम
खुद तो छाँही में बैठे हो
हमको दिखलाते हो घाम
अब न छाँटो ये लन्तरानी
चिरकुटई की है लंबी कहानी
टाइम बहुत हो गया अगर है
सो जाओ अब पीकर पानी
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