Saturday, September 04, 2004

ठलुआपने के मारे ये मुहल्‍लों के नाम


कभी-कभी तो हद हो जाती है ठलुआपने की । कर जाते हैं मौज में लोग और झेलती हैं आने वाली नस्‍लें ।

अब कौन भनभनाता है भन्‍नाना पुरवा, कानपुर में ?

कुछ बेचारे तो घर का गद्‍दा तक खरीदने में शरमाते हैं कि कोई ठेलुहई में ही न पूछ बैठे कि भैया घर तो है चटाई मोहाल में और सोओगे गद्‍दे में ।

एक सज्‍जन जिनके बारे में दंतकथा आज तक मशहूर है कि किस प्रकार एक चूहे के सामने उनकी धोती की लांग नामक गांठ खुल गयी थी और कालांतर में वह नंगू पाण्‍डे के नाम से लोकप्रिय हुए । अब उनसे पता पूछो तो मिमियाने से कुछ मिलती जुलती आवाज में लाठी मुहाल ही बतायेंगे । आखिर बाप- दादाओं ने और कोई चारा ही जो नहीं छोडा ।

अगर मेरी स्‍मृति साथ दे रही है तो जबलपुर जैसे गैर-ठलुहा शहर में भी एक बाज़ार है जो गडबडा कहलाता है।

कलकत्‍ते में एक मकान है जिसमें व्‍यापारियों की गद्‍दियां हैं और जहां सारा काम सब बहुत मिल जुल कर करते हैं, उसका नाम झगडा कोठी है

अब सब हमीं बतायेंगे कि बाकी ठेलुहे भी कुछ करेंगे?







3 comments:

अनूप शुक्ला said...

मोहल्ले तो तमाम हैं.बादशाही नाका बिना बादशाह का.परेड में कोई परेड नहीं.चमनगंज बिना चमन .और न जाने क्या-क्या.कुछ मोहल्ले अपने नाम को सही भी ठहराते हैं.बकरमंडी में बकरे बिकते हैं.सर्राफा में सुनार हैं.बहरहाल बढि.या है.

Anonymous said...

Bhaiya Hindi main pata nahin kaise likhte hai.
par Lucknow main Garbarjhala, Mathura main Chuna kankar( mere nana ka mohalla) aur bulandshahar main Ita Rori
bhi jehan main aate hai. Ek saheb ke pita ne badi shaan ke saath anne bete ka naam Sewle Ram rakhs kyoki complication hone ke karan Civil surgeon ko unhe dharti main lane main sangharsh karna pada.

अनूप शुक्ला said...

आगे भी कुछ लिखोगे कि यहीं रुके रहोगे?