पोर्टलैंड के अपने अलग ही तेवर हैं। गर्मी में तन-मन झुलसा देता है और सितंबर आते ही जैसे “कम सेप्टेम्बर” की धुन बजने लगती है। सितंबर को तो सरकार बहादुर ने भी फ़ाइलों में फॉल—अर्थात् पतझड़—का आधिकारिक मौसम घोषित कर रखा है। अब जब सैयाँ भए कोतवाल, तो फिर डर काहे का! पिघलकर बादल अचानक न जाने कहाँ से कूद पड़ते हैं।
पहले थोड़ी बूँदाबाँदी, फिर रिमझिम का ट्रेलर और उसके बाद भीगी शामें तथा उनींदी सुबहें मिलकर मौसम का ऐसा पाँसा पलटती हैं, मानो इस नगर ने गर्मी के बारे में कभी सुना ही न हो।
पोर्टलैंड में मौसम बदलता नहीं, बाक़ायदा नेताओं की तरह अपना पिछला बयान वापस लेता है।
सरकार बहादुर का फॉल
सितंबर की एक और ख़ासियत है। किसी ग़लत समय पर फ्रीवे या हाईवे पर निकल जाइए तो सड़क के दूसरे छोर पर सूरज कमर पर हाथ रखे, किसी मुहल्ले के गुंडे की तरह आँखों में आँखें डालकर आपका इंतज़ार कर रहा होता है। सड़क भी बेझिझक सीधी उसी के दरवाज़े पर जाती दिखाई देती है।
आपकी गाड़ी सूरज की ओर बढ़ रही होती है, सूरज आपको घूर रहा होता है और आप किसी मानिनी नायिका की तरह उसे कनखियों से तिरछा देखते हुए गाड़ी को सड़क पर रखने की कोशिश कर रहे होते हैं। उस समय आपका विवेक, सूरज से आपकी पुरानी दोस्ती और पोर्टलैंड में गाड़ी चलाने का अनुभव—ये तीनों मिलकर ही आपको सुरक्षित घर पहुँचाते हैं।
सड़क के उस छोर पर सूरज
और तभी आप भूल जाते हैं कि इसी सड़क पर, किसी दूसरे समय पूरब की ओर जाते हुए, सड़क के छोर पर हमारा प्रिय ज्वालामुखी माउंट हुड राह रोके खड़ा मिलेगा—विशाल, बर्फ़ से ढका, मौन और गंभीर।
ढलते सूरज की गुंडई के उलट, माउंट हुड किसी पुराने ऋषि की तरह बिना कुछ बोले हमें अपने बौनेपन और अपनी सीमाओं का एहसास करा देता है।
विलैमेट नदी को शहर के बीचोंबीच बहाते हुए, कोलंबिया नदी के एक किनारे पर बसा यह इंटरस्टेट-5 का नगर अपनी उदार मानसिकता के लिए कुख्यात है। कुख्यात इसलिए कि प्रसिद्धि की भी एक सीमा होती है; पोर्टलैंड ने उसे भी उदारता से पार कर लिया है।
पोर्टलैंड कभी हिप्पी संस्कृति का गढ़ रहा है और उसका थोड़ा-बहुत नशा आज भी इसकी हवा में घुला हुआ है। हमने अल्बर्टा इलाके के एक पिज़्ज़ा रेस्तरां के दरवाज़े पर लिखा देखा—
“Hippies use backdoor.”
मूलतः यह हिप्पियों के लिए एक तिरस्कारपूर्ण संकेत रहा होगा—तुम लोग सामने के दरवाज़े से आने योग्य नहीं हो, पीछे वाला दरवाज़ा इस्तेमाल करो।
लेकिन हिप्पी समुदाय ने, और विशेषकर पोर्टलैंड ने, उस तिरस्कार को भी लपक लिया। उसे अपनी प्रति-संस्कृति का तमगा बनाकर इतना लोकप्रिय कर दिया कि बाद में ऐसा बोर्ड लगाने में लोगों को अपमान से अधिक आनंद आने लगा।
कोई और नगर होता तो बोर्ड उतरवाता; पोर्टलैंड ने उसे दीवार पर सजाकर कहा—अच्छा, हमारे लिए है? फिर तो बढ़िया है!
अल्बर्टा इलाका अपने रंगीन भित्तिचित्रों के लिए मशहूर है। यहाँ दीवारें केवल इमारतें थामने का काम नहीं करतीं; वे बयान देती हैं, सवाल पूछती हैं। कहीं रंगों में विरोध है, कहीं पहचान की घोषणा, कहीं कोई सामाजिक संदेश और कहीं ऐसा चित्र, जिसका अर्थ समझ में न आए तो आप उसे आधुनिक कला मानकर आगे बढ़ सकते हैं।
हिप्पियों का पिछला दरवाज़ा
उधर हॉलीवुड इलाका स्वतंत्र फ़िल्मों, फ़िल्मप्रेमियों और फ़िल्म-संबंधी क्लबों का केंद्र बन गया है। यहाँ मौजूद पुराना हॉलीवुड थिएटर इन सारी फ़िल्मी खुराफ़ातों का अड्डा है।
यहाँ फ़िल्म केवल देखी नहीं जाती; उस पर चर्चा होती है, उसकी व्याख्या होती है और कभी-कभी इतनी गंभीर व्याख्या होती है कि फ़िल्म बनाने वाला भी सुन ले तो उसे अपने आशय का पहली बार पता चले।
फ़िल्मी खुराफ़ातों का अड्डा
नगर के डाउनटाउन के बीचोंबीच है पोर्टलैंड का अँगना—पायनियर कोर्टहाउस स्क्वायर। यहाँ वाले इसे पोर्टलैंड का “लिविंग रूम” कहते हैं। पूरे एक ब्लॉक में फैला खुला स्क्वायर, कुछ-कुछ ऐम्फ़ीथिएटर की शक्ल में।
यहाँ कुछ निठल्ले बैठे गप्पें मारते मिल जाएँगे, कुछ खाते-पीते, कुछ कॉफ़ी सुड़कते हुए।
किसी कोने में खुले आसमान के नीचे शतरंज की बाज़ी चल रही होगी—दो खिलाड़ी मोहरों में उलझे होंगे और चार दर्शक बिना सलाह माँगे यह समझा रहे होंगे कि घोड़ा कहाँ चलना चाहिए था।
और दूसरी तरफ़ किसी कामकाजी पोर्टलैंडिये को सूट पहने, हाथ में छाता लिए कदम बढ़ाते हुए मूर्ति में ढाल दिया गया है। एक हाथ आगे बढ़ाए यह अम्ब्रेला मैन ऐसा लगता है जैसे कह रहा हो—आइए, थोड़ी जगह आपके लिए भी है।
इंडिया डे—पंद्रह अगस्त के आसपास वाले सप्ताह में—और दुनिया भर की संस्कृतियों से जुड़े अनेक उत्सव भी यहीं होते हैं।
पोर्टलैंड का लिविंग रूम है, इसलिए जो भी आए, अपने घर की कोई न कोई चीज़ साथ ले आता है—संगीत, नृत्य, भोजन, भाषा या कम-से-कम कॉफ़ी।
पोर्टलैंड का लिविंग रूम
खाने-पीने का शौकीन है पोर्टलैंड। फूड कार्ट के लिए तो विशेष रूप से। जैसे भारत में खाऊ गलियाँ और खाने-पीने के अड्डे होते हैं, यहाँ जगह-जगह फूड कार्ट मिलेंगे। बैठने, चुहल करने, मनपसंद स्ट्रीट फूड खाने और बेवजह गप्पें मारने की बढ़िया जगह।
एक ही स्थान पर मैक्सिकन टैको, भारतीय चाट, थाई करी, कोरियाई व्यंजन और किसी ऐसे देश का खाना भी मिल सकता है जिसका नाम आपने भूगोल की परीक्षा के बाद पहली बार सुना हो।
पोर्टलैंड भोजन के मामले में विश्वबंधुत्व को गंभीरता से लेता है—बशर्ते वह किसी छोटी प्लेट में सॉस डालकर परोसा जा सके।
कॉफ़ी का तो अमेरिका का पूरा उत्तर-पश्चिमी इलाका ही शौकीन है। स्टारबक्स का जन्म भी यहीं से नक्शे में एक बित्ता ऊपर और गाड़ी से लगभग तीन घंटे की दूरी पर हुआ था। इसलिए लीजिए, तरह-तरह की कॉफ़ी।
कौन-सी बीन चाहिए, कहाँ की चाहिए, कितनी भुनी हुई चाहिए, दूध कौन-सा होगा, झाग कितना होगा, तापमान क्या होगा, शक्कर होगी या नहीं, सिरप कौन-सा पड़ेगा—इन सारे प्रश्नों का उत्तर देने के बाद लगता है कि आपकी कॉफ़ी नहीं बनी, कुंडली बन गई।
अब बरिस्ता केवल इतना नहीं बताता कि कॉफ़ी कैसी है; थोड़ी मेहनत करे तो यह भी बता सकता है कि इसे पीने के बाद आपके ग्रह किस भाव में बैठेंगे।
कॉफ़ी नहीं, कुंडली
बीयर का भी बड़ा केंद्र है—माइक्रोब्रुअरी पर माइक्रोब्रुअरी। माइक्रोब्रुअरी यहाँ उद्योग कम और जनांदोलन अधिक मालूम पड़ती हैं।
हर मोहल्ले की अपनी बीयर है और हर बीयर के पीछे एक कथा—किस पानी से बनी, किस अनाज से बनी, किस बैरल में रही और पीने के बाद आपको किस प्रकार के आध्यात्मिक अनुभव की संभावना है।
पढ़ाकुओं की बस्ती भी यहीं बसती है। पॉवेल्स सिटी ऑफ बुक्स—नई-पुरानी किताबों की ऐसी दुनिया जो पूरे एक सिटी ब्लॉक में फैली है। बड़े-बड़े हॉल, तीन मंज़िलें और सीढ़ियों की दीवारों पर नोबेल पुरस्कार विजेताओं के नाम।
वहाँ फोटो खिंचाने के बाद कसम से बड़ी इंटेलेक्चुअल टाइप फीलिंग मन में प्रवेश कर जाती है।
आप दिन भर बिताइए, किताबें उलटिए-पलटिए, कॉफ़ी पीजिए और फिर उतनी किताबें ख़रीद लाइए जितनी पढ़ने के लिए अगला जन्म भी थोड़ा व्यस्त हो जाए।
हम एक बार अनूप शुक्ला के साथ वहाँ गए थे। बाहर एक कवि टाइपराइटर लेकर बैठा था। अपना नाम और उस समय का मूड बताइए, वह आपके लिए वहीं कविता लिख देगा।
हमने उससे अनूप शुक्ला पर कविता लिखने को कहा। शायद यह उसकी ज़िंदगी का सबसे कठिन प्रोजेक्ट होगा, लेकिन लिख डाला पट्ठे ने।
यह पोर्टलैंड है—दूसरे शहरों में आदमी फुटपाथ पर अपना सामान बेचता है; यहाँ अपना मूड बताइए, कविता की रसीद कट जाती है।
मूड बताइए, कविता पाइए
सर्दी के दिनों में पोर्टलैंड एकाध बार सफ़ेद बर्फ़ का भी आह्वान कर लेता है। न्यूयॉर्क, शिकागो या बोस्टन की तरह बहुत अधिक नहीं—हर चीज़ अपने संतुलन में, किसी की अति नहीं।
अलबत्ता जितनी बर्फ़ गिरती है, उतनी में ही नगर का यातायात अपने सारे पूर्वजन्म याद करने लगता है।
इस हिमोत्सव में मुख्य सड़कों पर नगर प्रशासन थोड़ा नमक, डी-आइसर और अपनी प्रशासनिक इच्छाशक्ति छिड़क देता है; लेकिन मुहल्लों की गलियाँ प्रायः प्रकृति के भरोसे छोड़ दी जाती हैं।
बर्फ़ पिघले तो अपने आप पिघले—हम न कहें, जाओ!
लेकिन यह ज़िद्दी नगर इस कंजूसी से बचे नमक को उठाकर स्वादिष्ट आइसक्रीम में डाल देता है और ब्रांड बन जाता है—सॉल्ट एंड स्ट्रॉ। लोग बाक़ायदा लाइन लगाकर आइसक्रीम खाने पहुँचते हैं।
सड़क की बर्फ़ के लिए नमक नहीं, पर आइसक्रीम के लिए पूरा सम्मान। प्राथमिकताएँ स्पष्ट हैं।
नमक की प्राथमिकताएँ
पुलों का शहर है पोर्टलैंड। तरह-तरह के पुल—ऊँचे, नीचे, पुराने, नए, उठने वाले, खुलने वाले और ट्रैफ़िक को रोककर नाव को पहले जाने देने वाले।
विलैमेट के दोनों किनारों को जोड़ते ये पुल शहर को केवल पार नहीं कराते, उसकी शक्ल भी बनाते हैं।
पोर्टलैंड से थोड़ा आगे कोलंबिया नदी पर “ब्रिज ऑफ द गॉड्स” है—देवताओं का पुल। अद्भुत दृश्यों के बीच शान से ओरेगन और वॉशिंगटन के किनारों को जोड़ता हुआ।
देवताओं ने वास्तव में उसका इस्तेमाल किया था या नहीं, इसका कोई ट्रैफ़िक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है; नश्वर मनुष्यों से टोल रूपी दक्षिणा अवश्य ली जाती है।
पुलों का नगर
अब ऐसा नगर थोड़ा खिलाड़ी भी होगा। खिलाड़ी है तो नाइकी का मुख्यालय भी इसके उपनगर बीवर्टन में है। कमाल यह है कि नाइकी का मुख्यालय बीवर्टन में है भी और नहीं भी। यह अमेरिका में ही संभव है।
शहर के बीच कई सौ एकड़ में फैला परिसर नाइकी के पास है, लेकिन वह बीवर्टन की नगर-सीमा से बाहर, अनइनकॉरपोरेटेड क्षेत्र में आता है।
यानी पता बीवर्टन का, पहचान बीवर्टन की, लेकिन बीवर्टन की सिटी काउंसिल कहे—भैया, यह हमारा होकर भी हमारा नहीं है।
नाइकी के जूते की तरह मुख्यालय भी सीमा को छूता है और आगे निकल जाता है।
बीवर्टन में होकर भी नहीं
पोर्टलैंड का ट्रैफ़िक भी अलमस्त है—अपनी गति से चलता है और समय-समय पर आपको आपकी गति का एहसास भी करा देता है।
हम 1995 में यहाँ नए-नए आए थे। एक दिन किसी मित्र को हवाई अड्डे छोड़ने जा रहे थे। शायद ज़रा जल्दी में रहे होंगे कि पीली बत्ती देखकर चौराहा पार करने निकल पड़े।
हमारे चौराहा पार करने से पहले ही बत्ती लाल हो गई और पीछे पुलिस बाबू नीली बत्ती जलाए प्रकट हो गए। उन्होंने मुस्कराकर टिकट दिया, हमने मुँह लटकाकर ले लिया।
टिकट अलग, ज्ञान मुफ़्त
घर पहुँचे तो अपने दुःख-निवारक मित्र याद आए। वे बीस की गति-सीमा में तीस और पचपन की सीमा में पैंतीस पर गाड़ी चलाने—अर्थात् तेज़ और धीमे, दोनों दिशाओं के यातायात-अपराधों—में टिकट प्राप्त कर चुके थे।
इसी कारण ट्रैफ़िक-अपराध की दुनिया में उनकी गिनती किसी माफ़िया भाई जैसी होती थी, ख़ासकर हम लोगों के बीच। हम भी उनका पूरा सम्मान करते थे।
हम उनकी शरण में गए। कथा सुनाई। उन्होंने कुछ देर सोचा, फिर बोले—रेड लाइट जम्प कर दी?
पहली बार हमने अपने अपराध का नाम सुना। हम इस नाम से प्रभावित भी हुए, अपने पर थोड़ा गर्व-सा भी हुआ। बिल्कुल वैसे ही जैसे धुरंधर को बाबू डकैत के सामने हुआ होगा।
भाई जी बोले—वही करो जो हमने किया था।
हमने पूछा—क्या?
बोले—कोर्ट जाओ।
अब टिकट के साथ कोर्ट-कचहरी भी करनी पड़ेगी! खैर, हम गए। जज साहब को अपने हिसाब से कथा सुनाई। बताया कि शायद बत्ती लाल होने से पहले हम निकल चुके थे।
पुलिसवाला भी आया था। वह खुर्राट कथावाचक निकला। उसने घटना ऐसी प्रामाणिकता से सुनाई कि हमसे ताली बजते-बजते रुकी।
जज साहब ने हमें दोषी घोषित कर दिया। अलबत्ता, इस देश और यातायात की इस नई दुनिया में हमारे नए होने के कारण आधा जुर्माना माफ़ कर दिया।
बाहर निकले तो वही पुलिसवाला मिल गया। हमने हाथ मिलाया। उसने पूछा—उस दिन जल्दी में थे क्या?
हमने कहा—न उस दिन जल्दी में थे, न आज हैं।
उसने कहा—तो सुनो, गाड़ी चलाते समय ऐसा-ऐसा और फलाँ-फलाँ किया करो। फिर वही सारी बातें समझाईं जिन्हें हम पचासों बार पढ़ चुके थे।
टिकट के पैसे अलग लगे थे, लेकिन ज्ञान-वर्षा बिल्कुल मुफ़्त थी।
दूसरा प्रसंग डाउनटाउन का है। एक जगह पैदल यात्रियों के सड़क पार करने का रास्ता बना था। मतलब कोई पैदल यात्री पार कर रहा हो तो गाड़ी को रुककर रास्ता देना था।
हमारे आगे एक बिना निशान वाली गाड़ी चल रही थी। वह एक पैदल यात्री को आते देखकर रुक गई। हमें लगा—न ट्रैफ़िक लाइट है, न कोई दूसरी बाधा; आदमी बेकार में रुक गया है।
हमने उसके पीछे से गाड़ी निकाली और बगल वाली लेन से पैदल यात्री के पहले आगे निकल गए।
अचानक पीछे वाली गाड़ी से तीखे हॉर्न की आवाज़ आई और उसकी छिपी हुई बत्तियाँ चमकने लगीं। हमें कुछ देर से ज्ञान प्राप्त हुआ कि जिसे हम साधारण गाड़ी समझ रहे थे, वह पुलिस की गाड़ी थी।
हमारी याददाश्त भी तेज़ है
हमने गाड़ी रोकी। पुलिसवाले ने पीछे अपनी गाड़ी लगाई, हमारे पास आया और खिड़की खुलवाकर पहले अच्छी-खासी ज्ञान-वर्षा की।
फिर बोला—आगे से ऐसा मत करना, ख़ासकर डाउनटाउन में। मेरी याददाश्त बहुत तेज़ है; मैं तुम्हें याद रखूँगा।
हमने भी कह दिया—हमारी याददाश्त भी बहुत तेज़ है। एक बार बात समझ में आ गई है तो दोबारा ऐसा नहीं करेंगे।
हमारी याददाश्त को अपनी याददाश्त के बराबर खड़ा देखकर उसने बुरा मानने की कोशिश की, लेकिन वाक्य के दूसरे हिस्से से प्रसन्न भी हुआ।
अंततः दोनों भावों के बीच उलझकर बोला—जाओ, अब ठीक है।
इस तरह पोर्टलैंड ने हमें धीरे-धीरे यातायात सिखाया—कभी जुर्माना लेकर और कभी ज्ञान देकर। परीक्षा दोनों बार सड़क पर ही हुई।
अब नगर का नाम पोर्टलैंड कैसे पड़ा, इसकी कथा पाठकजन प्रसन्न मन से सुनें ।
कोई तथाकथित राजा जी हुआ करते थे जो चवन्नी उछालकर दिल माँगते थे; इस नगर ने तो अपना नाम ही सिक्का उछलवाकर रख लिया।
मामला 1845 का है। एसा लवजॉय और फ्रांसिस पेटीग्रोव—दो साझेदार, जय और वीरू टाइप—उस ज़मीन के हिस्सेदार थे जिस पर आज पोर्टलैंड का डाउनटाउन बसा है। नगर बसाना था, इसलिए उसका नाम भी रखा जाना था।
इस कथा के जय बाबू—यानी एसा लवजॉय—बोस्टन, मैसाचुसेट्स से थे। वीरू गुरु—यानी फ्रांसिस पेटीग्रोव—पोर्टलैंड, मेन राज्य के एक नगर से आए थे।
स्वाभाविक था कि जय बाबू नगर का नाम बोस्टन रखना चाहते थे और वीरू गुरु पोर्टलैंड। ईर-बीर-फत्ते शैली में लड़ाई शुरू हुई।
जय कहिन—बोस्टन।
वीरू कहिन—पोर्टलैंड।
फत्ते कहिन—चलो सिक्का उछालो।
वैसे वहाँ फत्ते नाम का कोई था नहीं। सिक्का उछालने का सुझाव फिर कहाँ से आया—इतिहास इस विषय पर मौन है।
सन् 1835 की ताँबे की एक पेनी लाई गई और तय हुआ कि तीन उछालों में जो दो बार जीतेगा, नगर उसी के शहर का नाम पाएगा। सिक्का उछला, पेटीग्रोव गुरु वीरू की तरह ही जीत गए और बोस्टन हार गया।
जय, वीरू और पोर्टलैंड पेनी
शुक्र मनाइए कि सिक्का ऐसे गिरा। वरना आज हम पोर्टलैंड के बजाय बोस्टन से यह लेख लिख रहे होते और कितने मुहावरे बदलने पड़ते।
वही ऐतिहासिक सिक्का आज भी “पोर्टलैंड पेनी” के नाम से मशहूर है और ओरेगन हिस्टॉरिकल सोसाइटी के संग्रह में मौजूद है। एक छोटी-सी पेनी ने पूरे नगर का नाम रख दिया।
इतिहास कभी-कभी बड़े निर्णय बहुत छोटे बजट में कर देता है।
थोड़ी-बहुत कसर फिर भी बची थी तो भाई लोग अफ्रीकी वूडू से प्रेरित हुए और मनुष्य की शक्ल के डोनट बनाकर उनमें प्रेट्ज़ल की पिनें चुभो दीं। नाम रखा—Voodoo Doughnut।
अब आप डोनट खा रहे हैं या किसी की समूची बाधा का निवारण कर रहे हैं, यह स्पष्ट नहीं होता। पर मान्यता यही रखिए कि सारी अलाय-बलाय पोर्टलैंड से टल गई—
डोनट वूडू का जो खावै,
भूत-पिशाच निकट नहिं आवै।
अब कर लो जो करना है पोर्टलैंड का।
डोनट वूडू का जो खावै
और यदि “पोर्टलैंडिया” का ज़िक्र न करें तो बात अधूरी रह जाएगी। पहली बार सुनकर लगता है कि यह “कलकतिया” या “कनपुरिया” की तरह यहाँ के वाशिंदों के लिए कोई संबोधन होगा।
मगर असल में पोर्टलैंडिया देवी जी हैं—हाथ में त्रिशूल लिए, डाउनटाउन में पूरे तेवर के साथ मूर्ति के रूप में विराजमान।
उनकी मुद्रा देखकर लगता है कि नगर की ओर से अंतिम चेतावनी देने के लिए तैयार हैं—बहुत समझा लिया, अब हमसे समझो।
हमें हमारे हाल पर छोड़ दो
एक ओर माउंट हुड जैसा ज्वालामुखी, जो शांत अवश्य है पर पूरी तरह सेवानिवृत्त नहीं; दूसरी ओर प्रशांत महासागर सुनामी को परमाणु अस्त्र की भाँति इस्तेमाल करने की धमकी के साथ; और बीच में भूकंपों की संभावनाओं वाले इलाके में ठाठ से बैठा यह नगर।
शायद इसी तरह चलता है—आधा बादलों पर, आधा कॉफ़ी पर; थोड़ा किताबों में, थोड़ा बीयर में; कुछ कला में, हिप्पीपने में, कुछ खुराफ़ात में। और बाकी जो बचता है, वह विलैमेट में बहता रहता है।
कोई दूसरा शहर होता तो पल्ला झाड़कर किनारे हो जाता। पोर्टलैंड कहता है—हम तो नहीं सुधरेंगे, आप कोशिश करके देख लीजिए।
पोर्टलैंडिया भी शायद यही कहती हैं—
मुझे तुमसे कुछ न चाहिए,
मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।
होता है तो हो किसी को दर्द—
हम तो कहेंगे भैया,
कीप पोर्टलैंड वीयर्ड।
[चित्रों के बारे में: इस लेख के चित्र AI की सहायता से बनाए गए हैं। ये पोर्टलैंड के स्थानों और लेख के प्रसंगों की कलात्मक प्रस्तुतियाँ हैं, वास्तविक फ़ोटोग्राफ़ नहीं। कुछ दृश्य और विवरण कल्पनात्मक हैं।]









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